इस्लामिक तालीम के बड़े मरकज दारुल उलूम के चलते दुनियाभर में पहचान बनाने वाले देवबंद को अब भी मूलभूत सुविधाओं की दरकार है। अपने विकास के लिए इस क्षेत्र के लोगों ने बारी-बारी से सभी दलों को मौका दिया। सबसे अहम बात यह है कि पिछले कुछ चुनावों पर नजर दौड़ाए तो जिस दल की प्रदेश में सरकार बनी उसी पार्टी के प्रत्याशी को इस क्षेत्र की जनता ने विधानसभा पहुंचाया। मगर, जरूरी विकास नहीं हो पाया।
हालांकि वर्तमान सरकार ने सहारनपुर-मुजफ्फरनगर फोरलेन से क्षेत्र को बड़ी सौगात दी। इससे देवबंद शहर के ऊपर फ्लाईओवर निर्माण से जाम जैसी बड़ी समस्या से निजात मिलेगी। इसके अलावा यहां के लोगों की लंबे समय से जिला बनाने की मांग, पेयजल, सड़क जैसी समस्या से निजात के लिए लोग हर दिन संघर्षरत रहते हैं।
उत्तराखंड और मुजफ्फरनगर की सीमा से लगते हुए देवबंद विधानसभा पर पूरे प्रदेश की निगाहें रहती हैं। दारुल उलूम देवबंद और जमीयत उलेमा ए हिंद के बड़े नेताओं के चलते प्रदेशभर के मुसलमानों का रुझान सियासी दल यहीं से भांपने की कवायद करते हैं। क्षेत्र में लंबे समय से मूलभूत सुविधाओं की मांग चल रही है। जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद यहां के लोगों से किए गए वादे भूल जाते हैं।
सबसे अहम मांग यहां कनेक्टविटी की है। हालांकि पिछले कुछ महीनों में रेल मंत्रालय से यात्री सुविधाओं के लिए कई परियोजनाओं का शुभारंभ किया। रोडवेज डिपो की कमी के चलते स्थानीय लोगों को यातायात में समस्या होती है। डिग्री कालेज तो यहां है, उसमें साइंस की कक्षाओं की मांग लंबे समय से हो रही है। 10 साल बाद भी छात्र-छात्राओं के भविष्य को लेकर उठ रही मांग का समाधान नहीं हो पाया। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी भी यहां के लिए एक बड़ा मुद्दा है।
नगर में स्थित सीएचसी भी रेफर सेंटर बनकर रह गया है। वर्ष 2016 में बुखार का सबसे ज्यादा कहर क्षेत्र में रहा। इसके चलते 50 से ज्यादा जाने भी गई। सरकारी अमले की ओर से प्रभावी कदम नहीं उठाए जाने से लोग खासे नाराज रहे। संपर्क मार्ग और सीवर लाइनों का अभाव भी लोगों को परेशान करता है। सबसे बड़ी बात यह है कि मूलभूत सुविधाओं के नाम पर जनप्रतिनिधि अब तक उतना प्रभावी काम नहीं कर पाएं जितने की इस क्षेत्र को जरूरत है।
विकास के लिए सबको दिया मौका ः क्षेत्र के लोगों ने सभी दलों को मौका देकर उनसे विकास की आस लगाई। भाजपा से यहां से शशिबाला पुंडीर विधायक बनी तो वर्तमान में कांग्रेस के माविया अली को जनता से विधानसभा पहुंचाया। वर्ष 2002 में बसपा ने दलित-राजपूत फार्मूले के तहत यहां से राजेंद्र सिंह राणा को आजमाया और बसपा का यह फार्मूला कामयाब हुआ। एक साल बाद ही राजेंद्र सिंह राणा ने बगावत कर सपा ज्वाइन कर ली।
सपा की सरकार बनने के बाद उन्हें प्रदेश में मंत्री बनाया गया। इसके बाद 2007 में बसपा के मनोज चौधरी दलित-गुर्जर गठजोड़ के चलते विधानसभा पहुंचे। वर्ष 2012 में सपा के राजेंद्र सिंह राणा दोबारा जीते और सरकार में मंत्री बने। उनके कार्यकाल में देवबंद को कई सौगात मिली। हालांकि उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में बसपा की गैरमौजूदगी में कांग्रेस ने यहां से जीत हासिल की।
मुस्लिमों के रुझान पर टिकी है नजर
देवबंद विधानसभा सीट पर सर्वाधिक मुस्लिम मतदाता हैं, इनकी संख्या करीब 80 हजार है। इसके बाद दलित यहां प्रभावी भूमिका में हैं और 60 हजार की संख्या में हैं। राजपूत करीब 35 हजार, त्यागी ब्राह्मण 30 हजार, गुर्जर 40 हजार और अन्य जातियां 80 हजार हैं। सपा और कांग्रेस यहां मुस्लिमों को रिझाने में जुटी है।
सपा ने पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह राणा की पत्नी को प्रत्याशी बनाकर मुस्लिमों के साथ राजपूतों को अपने पाले में लाने की कोशिश की है। बसपा ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ की परिकल्पना बनाई है और माजिद अली को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने विधायक माविया अली को प्रत्याशी बनाया है और भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
एक नजर में देवबंद विधानसभा
कुल मतदाता - 326864
पुरुष मतदाता - 177306
महिला मतदाता - 149547
मतदान केंद्रों की संख्या - 178
मतदेय स्थलों की संख्या - 339
मेरा कार्यकाल 10 महीने का रहा है और इस दौरान जनता के विकास के लिए मैंने दिन रात काम किया है। जितना काम लोगों ने पांच साल में नहीं किया उससे ज्यादा मूूलभूत सुविधाओं पर मेरी ओर से काम कराया गया। यही कारण है कि देवबंद नगर पालिका में भी मेरे प्रत्याशी को जीत मिली। अपने शुरू कराए गए काम के दम पर जनता से समर्थन मांगूंगा।
- माविया अली, विधायक।