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कलयुग में गायब हुई रामायण और महाभारत की साबरा

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गौरेया - फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। वसंत ऋतु के महीने में कोयल की कू-कू के साथ गौरैया की चहचहाहट अब नहीं सुनाई देती है। स्वतंत्रता, उल्लास, परंपरा और संस्कृति का प्रतीक माने जाने वाली गौरैया का रामायण और महाभारत में साबरा के नाम से उल्लेख मिलता है। बढ़ते शहरीकरण की वजह से इस चिड़िया की प्रजाति लुप्त होने के कगार पर है।
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आज में गौरैया दिवस मना रहे हैं। इस चिड़िया को बचाने के लिए तमाम कवायद के तहत गौरैया संरक्षण पखवाड़ा भी मनाया जा रहा है। मगर, इसके सार्थक परिणाम बीते 15 वर्षों से न के बराबर ही सामने आए हैं। बीते दो दशक में गौरैया की प्रजाति खत्म होने की कगार पर पहुंच गई। पर्यावरणविद् संजय कुमार बताते हैं कि आधुनिकीकरण ने चिड़िया की इस प्रजाति को लगभग खत्म ही कर दिया है। अब यह गुजरे जमाने की बात हो गई, जब गौरैया की चहचहाहट सुनने को मिल जाए। दो दशक पूर्व तक शहर में गौरैया दिखाई दे जाती थी, लेकिन शहरीकरण और आधुनिकीकरण के साथ गौरैया लुप्त हो गई है। कुछ वर्ष पूर्व तक देहात क्षेत्रों में गौरैया देखने को मिलती थी, लेकिन अब देहात क्षेत्र में भी इनकी संख्या नाममात्र ही रह गई है।
प्रजाति खत्म होने की वजह
गौरैया की प्रजाति खत्म होने के कई कारण सामने आए हैं। पेट्रोल के दोहन से निकलने वाले मिथाइल नाइट्रेट छोटे कीटों के लिए विनाशकारी है। कीट, बाजरा, चावल व अनाज आदि गौरैया का भोजन हैं। मोबाइल नेटवर्क के टॉवर से निकलने वाली तरंगें भी इनके लिए हानिकारण हैं। इन तरंगों से पक्षियों के अंडे भी नष्ट हो जाते हैं। कच्चे और कड़ियों के मकान खत्म होना भी एक वजह है।
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ऐसे बचाएं गौरैया का अस्तित्व
पर्यावरण के जानकारों के मुताबिक अपने घरों की छतों या गार्डन में अनाज, बाजरा और चावल डालें। अगर घर में जगह है तो पेड़ लगाकर उन पर लकड़ी या नारियल के जूट से बने घोंसले को लगाएं। मिट्टी के साफ बर्तन में पानी भरकर रखें। छज्जों के नीचे छोटे-छोटे आले बनाएं, जिससे गौरैया वहां अपना घोंसला बना सके।
श्रीरामायण, महाभारत के अलावा लोक कथाओं में भी वर्णन
श्री बगलामुखी के अधिष्ठाता आचार्य रोहित वशिष्ठ और पंडित जितेंद्र शांडिल्य बताते हैं कि लोक कथाओं में गौरैया का वर्णन है। इसके अलावा श्रीरामायण और महाभारत में इसे साबरा के नाम से जाना गया है। गौरैया उल्लास, स्वतंत्रता, परंपरा और संस्कृति का प्रतीक है।
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