सहारनपुर में किताबों और यूनिफॉर्म में ज्यादातर पब्लिक स्कूलों के कमीशन का खेल शुरू हो चुका है। इस खेल में अभिभावक पिस रहे हैं। सवाल बच्चों के भविष्य का है। ऐसे में अभिभावक चाहकर भी विरोध नहीं कर पा रहे हैं।
अमर उजाला की टीम ने शुक्रवार को इस मामले में पड़ताल की । बातचीत में अभिभावकों का दर्द छलक उठा। कई अभिभावकों का कहना था कि मोदी जी और योगी जी को स्कूलों और प्रकाशक के इस भ्रष्टाचार के खिलाफ भी कुछ करना चाहिए।
कोर्ट रोड स्थित पूजा कांपलेक्स से किताबें लेकर निकल रहे देहरादून चौक निवासी निखिल के साथ उनकी बेटी भी थी। वह बेटी की सेकेंड क्लास की किताबें खरीदकर निकले थे। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी की किताबें 2900 रुपये की आई हैं, जिनमें अबेकस का सेट भी शामिल है।
अबेकस में एक किताब और एक बॉक्स है, जिसके 280 रुपये वसूले गए हैं, जबकि रेट भी प्रिंट नहीं है। किताबों के दाम को लेकर निखिल हैरान नजर आए। उनका कहना था कि स्कूल और पब्लिशर मिलकर मनमाने रेट पर किताबों पर प्रिंट कर अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रहे हैं।
इसी कांप्लेक्स से किताबें खरीदकर निकले मोहनलाल ने बताया कि उन्होंने अपने दो बच्चों की किताबें खरीदी हैं, जो 9000 रुपये से अधिक की आई हैं, जबकि यूनिफॉर्म और अन्य सामान खरीदा जाना अभी बाकी है। इसके अलावा स्कूल की एडमिशन फीस और ट्यूशन फीस अलग से जाएगी।
उनका कहना था कि मिडिल क्लास लोगों के लिए अपने बच्चों को अच्छे पब्लिक स्कूलों में पढ़ाना मुश्किल होता जा रहा है। इसके बाद अमर उजाला की टीम दिल्ली रोड पर कमिश्नर कार्यालय के ठीक सामने एक बुक स्टॉल पर पहुंची।
जो बुक स्टॉल कम और बुक का गोदाम अधिक लग रहा था। यहां अभिभावकों की लंबी कतार थी। यहां करीब एक दर्जन अलग-अलग स्कूलों के अभिभावक बच्चों की किताबें खरीदने आए थे। पुलिस लाइन निवासी एक महिला ने बताया कि बुक सेलर बिल देने में भी आनाकानी कर रहे हैं।
सोशल मीडिया को बना रहे हथियार
स्कूलों की मनमानी के खिलाफ खुलकर आने की बजाए अभिभावक सोशल मीडिया को हथियार बना रहे हैं। एक अभिभावक विवेक शर्मा ने अपने फेसबुक के जरिये नगर के एक बड़े स्कूल की मनमानी उजागर की है। उनका कहना है कि स्कूल ने एक खास दुकान से किताबें खरीदने की बात कही है। अन्य दुकानों पर वह किताबें मिल भी नहीं रही हैं। उन्होंने बताया कि किताब विक्रेता किताबों के साथ स्टेशनरी खरीदने का दबाव बना रहा है।
70 से 80 फीसदी तक ले रहे कमीशन
दिल्ली रोड पर एक दुकान से किताबें खरीदकर निकले राजीव और संजय का कहना है कि सरकार को आयकर विभाग के माध्यम से बुक सेलर्स के यहां छापेमारी करानी चाहिए। क्योंकि स्कूल और पब्लिशर मिलकर 50 से 60 फीसदी अधिक रेट प्रिंट कर मोटी कमाई कर रहे हैं। यदि किताबों के कागज और प्रिंट का खर्च निकाला जाए तो 40 से 50 रुपये बैठेगा मगर उन्हीं किताबों के 150 से 200 रुपये वसूले जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि स्कूल वार्षिक परिणाम जारी होने पर मार्क शीट के साथ ही अभिभावकों को पर्चियां थमा रहे हैं, जिनपर विशेष दुकानों से सामान खरीदे जाने की बात कही गई है।
स्कूलों के नाम की कॉपियां ही खरीदने का दबाव
अनेक बड़े स्कूल कमीशन के लिए पब्लिशर से अपने स्कूल के नाम की कॉपियां प्रिंट करा रहे हैं। यानी कॉपी की जिल्द पर स्कूल का नाम अंकित है। स्कूलों का कहना है कि बच्चों को स्कूल के नाम वाली कॉपी ही खरीदनी होगी। यानी बाजार से सामान्य कॉपी नहीं खरीद सकता है। इन कॉपियों के दाम 50 से 60 रुपये तक वसूले जा रहे हैं, जबकि बाजार में इनकी कीमत 40 से 35 रुपये तक है।
हम जल्द ही पब्लिक स्कूलों के साथ बैठक करने वाले हैं। रही बात किताबों और यूनिफॉर्म के एक दुकान विशेष से खरीदने का दबाव बनाने की तो यदि कोई अभिभावक शिकायत करता है तो प्रशासन उसकी जांच कराकर जरूरी कदम उठाएगा।
पीके पांडेय, डीएम।