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डॉक्टरों का मिला साथ, कोरोना को दी मात

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सुरेन्द्र मोहन कोशल - फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर/छुटमलपुर। जिले में अभी तक 390 कोरोना पॉजिटिव निकले हैं। इनमें से 343 मरीज ठीक होकर सकुशल घर लौट चुके हैं। खास बात यह है कि अभी तक जनपद में कोरोना से एक भी मौत नहीं हुई है। इस सबके पीछे डॉक्टरों की कड़ी मेहनत रही है। जिन्होंने ना केवल मरीजों का इलाज किया, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी बीमारी से लड़ने की हिम्मत दी। डॉक्टर्स-डे पर अमर उजाला ने चिकित्सकों के व्यवहार और सेवाभाव के बारे में जानने का प्रयास किया। पेश है ठीक होकर घर लौटे कुछ लोगों से बातचीत के अंश...
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-देवबंद निवासी गायत्री का कहना है कि जब मुझे संक्रमित होने का पता चला तो मैं बहुत घबरा गई थी। जिंदा रहने की आस पूरी तरह छोड़ चुकी थी, मगर कोविड अस्पताल फतेहपुर में डॉक्टरों और स्टाफ ने ना केवल जरूरी दवाएं दीं, बल्कि मेरी काउंसिलिंग कर हिम्मत को बढ़ाया। आज मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं।
-माहीपुरा के मोहम्मद तालिब ने का कहना है कि कोरोना संक्रमण की चपेट में आने के बाद मैं 24 दिन तक कोविड अस्पताल में रहा। अस्पताल के स्टाफ का व्यवहार बहुत ही अच्छा था। खाना पानी की जरूरतें तो पूरी हुईं ही, साथ ही डॉक्टरों ने बिना किसी भेदभाव के इलाज किया और साहस बढ़ाया।
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-रणखंडी निवासी सुनील कुमार ने बताया कि कोविड अस्पताल में दिन में डाक्टर चार बार राउंड पर आते थे। नर्सें हर आधा घंटे बाद कुशल पूछने आती थीं, सभी का व्यवहार पारिवारिक था। खाना भी बेहतर गुणवत्ता का मिला। डॉक्टरों और स्टाफ ने जो अपनापन दिखाया शायद उसी की वजह से आज स्वस्थ हूं।
-आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के कलकिरी गांव के शेख शाहरुख ने बताया कि जब मुझे अस्पताल लाया गया तो मैं डरा हुआ था। रमजान में रोजे भी अस्पताल में ही रखे। स्टाफ ने सहरी और इफ्तारी का पूरा इंतजाम किया। खाने पीने का इंतजाम बहुत अच्छा था। मुझे महसूस ही नहीं हुआ कि अस्पताल में हूं। मैं चिकित्सकों के सहयोग को कभी नहीं भूलूंगा।
नब्ज देखकर बता देते थे मर्ज, अब होती हैं जांच
-पुराने जमाने में डॉक्टर नब्ज देखकर बता देते थे मर्ज
संवाद न्यूज एजेंसी
सहारनपुर। पुराने जमाने में डॉक्टर नब्ज देखकर मर्ज को पहचान लेते थे, जिसके बाद सटीक इलाज भी होता था, मगर अब छोटी से छोटी बीमारी की पहचान के लिए महंगी जांचें लिखी जाती हैं।
कृष्ण औषधालय के संचालक डॉ. सुरेंद्र मोहन कौशल का कहना है कि 30 साल पहले डॉक्टर नब्ज देखकर बीमारी को पकड़ लेते थे। ज्यादातर बीमारियां जैसे ब्लड प्रेशर आदि पेट की खराबी की वजह से ही होते हैं। अब भी जो अच्छे वैद्य हैं वह नब्ज से बीमारियां पकड़ते हैं। पेट और गुप्त रोग संबंधी मरीज ही वैद्य के पास आते हैं। वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. कलीम अहमद का कहना है कि नब्ज से बीमारियों की पहचान हो जाती है, मगर अनुमान के आधार पर दवा नहीं दी जा सकती। बीमारी की पुष्टि के लिए जांच लिखते हैं। डॉ. सतीश कुुमार का कहना है कि पुराने समय में जांच की सुविधाएं नहीं थीं। नब्ज देखकर बीमारियों की पहचान कर दवा दे दी जाती थी। अब जांच में मरीज का पैसा जरूर खर्च होता है मगर इलाज सटीक होता है।
डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहा अस्पताल
सहारनपुर। एसबीडी जिला अस्पताल डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहा है। जानकर हैरानी होगी कि स्वीकृत 61 पदों में से 30 पद खाली पडे़ हैं। इनमें कई महत्वपूर्ण डॉक्टरों के पद शामिल हैं।
जिला अस्पताल में 19 ओपीडी बनी हुई हैं, जिनमें बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। मगर कॉर्डियोलॉजिस्ट, मनोरोग विशेषज्ञ, न्यूरो सर्जन, न्यूरो फिजीशियन, प्लास्टिक सर्जन, नेफ्रोलॉजिस्ट जैसे महत्वपूर्ण चिकित्सकों के पद खाली हैं। ऐसे में इन बीमारियों से जुड़े मरीजों को इलाज के लिए प्राइवेट डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है। जिला अस्पताल प्रशासन की ओर से कई बार डिमांड शासन को भेजी, मगर वर्षों से डॉक्टरों की कमी बनी हुई है।
बिना बताए नौकरी छोड़ रहे चिकित्सक
सहारनपुर। जिला अस्पताल से चिकित्सक लगातार अलविदा कह रहे हैं। कई चिकित्सकों ने वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्त योजना) के लिए भी आवेदन कर रखा है, लेकिन स्वीकृति नहीं मिल रही है। जानकारी मिली है कि एक महिला डेंटल सर्जन ने वीआरएस के लिए आवेदन किया था, जो नामंजूर कर दिया गया। इसके बाद से सर्जन नौकरी छोड़ गईं। करीब ढाई साल पहले एक सर्जन अचानक गायब हो गए। बाद में पता चला कि वह मेरठ के मेडिकल कॉलेज से एमडी कर रहे हैं। एक नेत्ररोग विशेषज्ञ करीब एक साल से गायब हैं। एक महिला नेत्र चिकित्सक करीब डेढ़ साल पहले नौकरी छोड़कर जा चुकी हैं। महिला पैथोलॉजिस्ट एक दिन का अवकाश लेकर गईं थीं, लेकिन नहीं लौटीं। अब वह पति के साथ दिल्ली में हैं। ऐसे में अस्पताल में कई रिटायर्ड चिकित्सकों से सेवा ली जा रही है।
करोड़ों में छूटते हैं स्टोर के ठेके
शहर में कई निजी अस्पताल ऐसे हैं, जिनमें मेडिकल स्टोर के ठेके करोड़ों रुपये सालाना में छूटते हैं। भले ही नियम दवा का साल्ट लिखने का हो। मगर ज्यादातर अस्पताल कंपनी विशेष की दवाओं की बिक्री करते हैं। अनेक डॉक्टर ऐसे हैं, जिनकी लिखी दवा केवल उन्हीं के स्टोर पर मिलती है। इसी का फायदा उठाकर वह दवाओं को अधिकतम दाम पर बेचते हैं।

डा कलीम अहमद- फोटो : SAHARANPUR

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