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कमिश्नर के गोद लिए गांव में कच्चे मकान में रह रहे लोग

Mon, 17 Jul 2017 12:03 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, सहारनपुर
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गांव में बने कच्चे मकान। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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सहारनपुर शहर से महज छह किलोमीटर दूर स्थित मल्हीपुर गांव आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जब लोगों को पक्के आवास देने की अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं चल रही हो, तब 30 से अधिक परिवार का छप्पर, टीन शेड और कच्चे मकानों में गुजर बसर करना व्यवस्था पर सवाल उठाता है। 
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तब सवाल और तीखे हो जाते हैं जब पता चले कि यह गांव मंडल के सबसे बड़े मुखिया कमिश्नर का गोद लिया हुआ है। इतना ही नहीं, यह गांव वर्ष 2008 में आदर्श गांव में भी रह चुका है। सबसे बड़ी बात यह है कि नए मंडलायुक्त ने अभी इस गांव को देखा तक नहीं है।

मल्हीपुर मिश्रित आबादी का गांव है। केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद तत्कालीन कमिश्नर ने मल्हीपुर गांव को गोद लेकर इसको संवारने के बड़े बड़े दावे किए थे।
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बदहाली में जिंदगी काट रहे ग्रामीणों को कमिश्नर के दावों में उम्मीद की किरण नजर आई थी, मगर अनदेखी और कुछ राजनीतिक कारणों से वह उम्मीद की किरण टूट सी गई। 

गोद लेने के तीन साल बाद अमर उजाला की टीम ने रविवार को गांव के विकास की हकीकत जानने के लिए गांव का दौरा किया। गांव की हालत देख लगा ही नहीं कि यह गांव कमिश्नर का गोद लिया हुआ है। या यह गांव कभी आदर्श गांव भी रहा होगा।

गांव में स्थित सरकारी स्कूल के पीछे बसी आबादी सबसे बदहाली में जी रही है। छप्पर में बैठी मिली 70 वर्षीय बाला (विधवा) ने बताया कि उसके बेटे मजदूरी कर परिवार का पेट पालते हैं, जिनकी हिम्मत नहीं है कि वह अपनी पक्की छत बना सके।

पड़ोस में ही रहने वाले पवन और तेजपाल अपने बच्चों को लेकर कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हैं। कच्ची छत को टपकने से बचाने के लिए छत पर काली पन्नी डाली हुई है। 

रमेश भी परिवार को लेकर कच्चे मकान में रहता है। ग्रामीणों ने बताया कि सैनी और कश्यप बिरादरी में ही 20 से अधिक परिवार कच्चे मकानों में रहते हैं। इतना ही नहीं, गांव की अनेक गलियों पर ईंट तक नहीं बिछी हैं। ऐसे में उनपर कीचड़ जमा है।

ज्यादातर परिवारों के पास शौचालय तक नही हैं। ऐसे परिवारों को शौच के लिए खेतों में जाना पड़ता है। मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र में भी समस्याएं कम नहीं हैं। 
 
एक तरफ प्रदेश सरकार एंटी भू माफिया स्क्वायड बनाकर सरकारी जमीनों और तालाबों को कब्जामुक्त कराने की बात कह रही है। वहीं कमिश्नर के गोद लिए गांव के तालाब पर वर्षों से कब्जा है, जिसे हटवाने के लिए अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।

स्थानीय लोगों ने बताया कि मामला कोर्ट में विचाराधीन है। गांव के मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र के लोगों ने उनके राशन कार्ड जबरन कटवाने का आरोप लगाया है।

बताया कि कई साल से उन्हें राशन नहीं मिल पा रहा है। बताया कि विधवा मेहराज की सात बेटियां हैं। घर में कमाने वाला कोई पुरुष नहीं है। मगर साजिश के तहत उसका राशन कार्ड भी कटवा दिया गया।

 लोगों का यह भी कहना है कि गांव को वर्ष 2008 में आदर्श गांव घोषित किया गया था। गांव में कच्छे मकान या छप्पर नए तो बने नहीं हैं। जिस गांव में इतनी बड़ी संख्या में छप्पर और कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हों। उस गांव को आदर्श गांव घोषित करना अपने आप में सवाल खड़े करने        वाली बात है।  

मैंने कुछ दिन पहले ही यहां ज्वाइन किया है, मगर मेरे गांव में जाने का कार्यक्रम बना हुआ है। जल्द गांव में जाकर वहां के वास्तविक हालात का जायजा लिया जाएगा। जो खामियां हैं उन्हें चिह्नित कर दूर कराने का प्रयास किया जाएगा।       
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- दीपक अग्रवाल, कमिश्नर।
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