सहारनपुर। इन दिनों में जिले में गेहूं फसल की कटाई और थ्रेसिंग का काम जोरों पर है। गेहूं कटाई के साथ ही दमा, अस्थमा व टीबी रोगियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। थ्रेसिंग के दौरान भूसा सांस के साथ अस्थमा और टीबी मरीजों के शरीर में प्रवेश कर रहा है। जिससे उनका सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। ऐसे मरीज जिला अस्पताल में पहुंच रहे हैं। डॉक्टर दवाई देने के साथ ही उन्हें विशेष सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं।
पिछले कुछ दिनों से मौसम में बदलाव आया है। तापमान 36 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इसके साथ ही इस समय गेहूं की कटाई होने के साथ-साथ थ्रेसिंग का काम भी चल रहा है। कटाई के बाद गेहूं को मशीन से निकाला जाता है। इसके साथ ही भूसे के जो कण होते हैं वह हवा में मिल जाते हैं। हवा का रुख जिस तरफ होता है भूसे के कण उसी तरफ आबादी में पहुंच जाते हैं। इस समय चारों तरफ गेहूं की कटाई हो रही है, इसलिए सांस के रोगियों मुश्किलें बढ़ गई है। इसी वजह से एसबीडी जिला अस्पताल में भी सांस रोगियों की संख्या में इजाफा हो गया है। फिजिशियन की ओपीडी में 15 से 20 फीसदी ऐसे आ रहे हैं, जिन्हें गेहूं कटाई के बाद से सांस लेने में दिक्कत हो रही है। रोजना भर्ती भी हो रहे हैं।
बीमार होने की संभावना अधिक
जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. अनिल कुमार वोहरा ने बताया कि इस मौसम में धूल ज्यादा उड़ती है। इससे सांस रोगियों की मुश्किलें बढ़ जाती है। भूसे के कण इतने बारीक होते हैं कि वह दिखाई भी नहीं देते और सांस से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। जिन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है, ऐसे रोगी ओपीडी में पहुंच रहे हैं। यदि ज्यादा दिक्कत हो तो तुरंत उपचार कराना चाहिए।
क्या है अस्थमा
- अस्थमा में श्वसन नलिकाएं प्रभावित होती हैं।
- अस्थमा होने पर इन नलिकाओं में सूजन आ जाती है।
- धूल व प्रदूषण के कण नलिकाओं तक पहुंचते हैं, तो बेचैनी होती है।
- नलिकाएं संकरी व संवेदनशील हो जाती हैं। सांस लेने पर कम हवा फेफड़ों तक पहुंचती है।
- अस्थमा के अटैक होने से मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है।