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Saharanpur: 11 गांवों का दर्द, पढ़ाई के लिए छोड़ना पड़ता है घर, दुश्वारियों से जूझ रहीं बेटियां

Mon, 19 Feb 2024 12:02 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सहारनपुर

सार

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के तमाम स्लोगन जगह-जगह लिखे दिखाई देंगे, लेकिन खादर क्षेत्र के 11 गांव ऐसे भी हैं जहां पर बेटी तो दूर 8वीं कक्षा के बाद बेटों को भी दुश्वारियों के बीच पढ़ना पढ़ता है।
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प्राथमिक स्कूल कुंडा कलां। संवाद
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विस्तार
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सहारनपुर जनपद के गंगोह में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के तमाम स्लोगन जगह-जगह लिखे दिखाई देंगे, लेकिन खादर क्षेत्र के 11 गांव ऐसे भी हैं जहां पर बेटी तो दूर 8वीं कक्षा के बाद बेटों को भी दुश्वारियों के बीच पढ़ना पड़ता है। इससे आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें 20-25 किमी दूर गंगोह जाना पड़ता है।

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ऐसे में बेटे तो किसी तरह पढ़ भी लें, लेकिन मजबूरीवश अधिकतर बेटियों को पढ़ाई छोड़नी पड़ रही है। कुछ परिवार तो ऐसे भी है, जिन्होंने 8वीं के बाद बच्चों की पढ़ाई के लिए गांव तक छोड़ना पड़ गया।

 

इन गांवों में गंगोह ब्लाॅक के कुंडा, शाहपुर, कुंडा टपड़ी, बसी, बेगी रुस्तम, बेगी बांसदेवा, बेगी नाजर, ढलावली, मानपुर, दौलतपुरी और मानपुर थली शामिल है। इन गांवों में एक भी इंटर कॉलेज नहीं है।

इन्हें छोड़ना पड़ा गांव
गांव बसी निवासी साजिद और माजिद राव ने बताया कि जब उनके पिताजी प्रधान थे। उन्होंने इंटर कॉलेज की स्थापना कराने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन वह मंजूर नहीं हो सका। बच्चों की आगे की शिक्षा की व्यवस्था न होने के कारण उन्होंने भी गांव को छोड़कर गंगोह में अपना घर बना लिया। ताकि बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसी गांव के अय्यूब राणा, कुंडा कला निवासी राव हारुन, डाॅ. यमन भी अपने बच्चों को करनाल में रहकर पढ़ा रहे हैं। सैकड़ों परिवार अपने गांवों को छोड़ कर गंगोह, करनाल या फिर सहारनपुर में रहकर अपने बच्चों को पढ़ाने को मजबूर हैं।

25000 की आबादी पर एकमात्र प्राथमिक स्कूल
25000 की आबादी वाले गांव कुंडा कला में वर्ष 1962 में प्राथमिक विद्यालय की स्थापना की गई थी। इसके बाद यहां कोई स्कूल नहीं खुल सका है। इस स्कूल में 250 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल में कक्षों की कमी के कारण इससे ज्यादा बच्चों के प्रवेश अध्यापक नहीं लेते हैं। कोरोना काल में तो यहां आधे बच्चों को एक दिन और शेष आधे को दूसरे दिन बुलाया जाता था।

कुछ ऐसा है ग्रामीणों का दर्द
गांव कुंडा कला निवासी मसरूर राणा ने बताया पूर्व सांसद मंसूर अली खान एवं पूर्व विधायक डॉ. सुशील चौधरी द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान गांव में राजकीय इंटर कॉलेज स्वीकृत करा दिया गया था। लेकिन गांव की राजनीति के चलते जमीन जमीन मुहैया नहीं हो सकी।

शाहपुर के ग्राम प्रधान अरविंद चौधरी का कहना है कि जागरुकता के अभाव के कारण खादर क्षेत्र के गांवों में इंटर कॉलेज नहीं बन पा रहा है, लेकिन वे फिर भी प्रयास कर रहे हैं कि उच्च शिक्षा के लिए यहां इंटर कॉलेज स्थापित कराया जाए।

गांव नया कुंडा के ग्राम प्रधान सनव्वर राव का कहना है कि उन्होंने प्रधान बनते ही सबसे पहले शिक्षा पर ध्यान दिया है। जिसके परिणामस्वरूप गांव में हाई स्कूल निर्माणाधीन है। उम्मीद है कि अगले सत्र से स्कूल में प्रवेश प्रारंभ हो जाएंगे।
 
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गांव कुंडा कला के प्रधान बने मोहम्मद गुलफाम ने बताया कि इंटर कॉलेज नहीं होने से बच्चों की पढ़ाई को लेकर काफी परेशानी होती है।

कुंडा खुर्द के प्रधान रईस अहमद का कहना है कि जनप्रतिनिधियों ने खादर क्षेत्र की उपेक्षा की है यही कारण है कि आजाद के 76 सालों बाद भी यहां पर्याप्त संख्या में शिक्षण संस्थान नहीं खुल सके हैं।

कुंडा कला और कुंडा खुर्द के लिए जूनियर हाईस्कूल का प्रस्ताव गया हुआ है। जल्द ही इस पर अमल होगा। प्राइमरी एजुकेशन की व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त है। - अंबिका ओझा, खंड शिक्षा अधिकारी गंगोह।
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