देवबंद। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मौलाना आमिर खान मुत्ताकी के दौरे को लेकर जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि अफगानिस्तान से हमारा केवल इल्मी और रूहानी (आध्यात्मिक) संबंध नहीं है, बल्कि इसके साथ हमारे तहजीबी और सांस्कृतिक रिश्ते भी रहे हैं। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मूल रूप से एक आलिम-ए-दीन (धार्मिक विद्वान) हैं ।
विदेश मंत्री मौलाना आमिर खान मुत्ताकी के दिल्ली रवाना होने के बाद मीडिया से बात करते हुए मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि भारत की जंग-ए-आजादी से भी अफगानिस्तान का एक विशेष संबंध रहा है। आज की पीढ़ी शायद इस बात से परिचित न हो, लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि आजादी की लड़ाई के दौरान दारुल उलूम के सदर-उल-मुदर्रिसीन (प्रधान अध्यापक) शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन के आदेश पर अफगानिस्तान में ही हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने एक जला-वतन (निर्वासित) सरकार कायम की थी।
उस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप सिंह, प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली और विदेश मंत्री मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी थे। मौलाना मदनी ने कहा कि अफगानिस्तान की जनता ने भी विदेशी कब्जे से अपने वतन को आजाद कराने के लिए हमारे बुज़ुर्गों का ही तरीका अपनाया।
अफगानिस्तान की जनता ने रूस और अमेरिका जैसी बड़ी शक्तिशाली ताकतों को मात देकर आजादी हासिल की है। मौलाना मदनी ने कहा कि वर्ष 1991 के बाद यह पहला मौका है, जब अफगानिस्तान का कोई प्रतिनिधिमंडल विदेश मंत्री मौलाना आमिर खान मुत्ताकी की अगुवाई में भारत के दौरे पर आया है।
मौलाना अरशद मदनी ने विदेश मंत्री के देवबंद दौरे के बारे में बताते हुए कहा कि मौलाना आमिर खान मुत्ताकी ने दारुल उलूम से अपनी निस्बत (संबंध) और अकीदत (श्रद्धा) का इजहार किया। उन्होंने बार-बार इसे मादर-ए-इल्मी (इल्म की मां) और रूहानी मरकज (ज्ञान और आत्मा का केंद्र) कहकर संबोधित किया।
मदनी ने कहा कि उन्होंने पाकिस्तान के उस मदरसे से शिक्षा प्राप्त की है, जिसकी नींव महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हुसैन अहमद मदनी के एक शिष्य मौलाना अब्दुलहक ने रखी थी।