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समाज को दिशा देने वाला है मुंशी प्रेमचंद का साहित्य

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डा विष्णुकांत शुक्ल - फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। मुंशी प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के महान भारतीय लेखकों में से एक हैं। उनके साहित्य की प्रासंगिकता बरकरार है, मगर विडंबना है कि अधिकांश युवा उनकी रचना तथा पात्रों के बारे में नहीं जानते। आलम यह है कि महाविद्यालयों में बीए करने वाले विद्यार्थियों में 50 फीसदी छात्र ही हिंदी विषय का चयन करते हैं। इसकी पुष्टि जेवी जैन कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राकेश ने भी की है। हिन्दी के विद्यार्थियों में से 70 फीसदी विद्यार्थी ऐसे हैं, जो हिन्दी में 35 से 50 फीसदी तक नंबर लाते हैं।
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साहित्य हमेशा प्रासंगिक होता है: डॉ. शुक्ल
जेवी जैन कॉलेज के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. विष्णुकांत शुक्ल का कहना है कि साहित्य हमेशा प्रासंगिक ही होता है। समाज में जो भी उथल-पुथल मची है वह इसी वजह से है क्योंकि युवा साहित्य से दूर हो गए हैं। मुंशी प्रेमचंद के गोदान, बड़े घर की बेटी, नमक का दरोगा आदि उपन्यास इसके उदाहरण हैं।
प्रेमचंद ने विसंगतियों पर चोट की : डॉ. सिंह
राजकीय महाविद्यालय छपरौली के पूर्व प्राचार्य एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. एन सिंह का कहना है कि मुंशी प्रेमचंद का साहित्य सामाजिक और सांस्कृतिक दस्तावेज है। प्रेमचंद ग्रामीण विसंगतियों के कथाकार हैं।
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प्रेमचंद का साहित्य अमर है: डॉ. चंद्रा
जेवी जैन कॉलेज के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राकेश चंद्रा का कहना है कि मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास सामाजिक अव्यवस्थाओं और विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। जब तक समाज में विसंगतियां रहेंगी उनका साहित्य प्रासंगिक रहेगा। समाज खासकर युवाओं को उनके साहित्य को पढ़ने की जरूरत है।

डा राकेश चन्द्रा- फोटो : SAHARANPUR

डा एनसिंह- फोटो : SAHARANPUR

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