महिलाओं का दर्द जानती मायावती।
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सहारनपुर में शब्बीरपुर की जातीय हिंसा के बाद सहारनपुर पहुंची बसपा सुप्रीमो मायावती अपने पूरे रौ में थीं। कानून व्यवस्था के जरिए केन्द्र और प्रदेश की भाजपा सरकार पर निशाना साधकर उन्होंने दलितों की दुखती नस भी पकड़ी।
मगर, जातीय चौहद्दी से बाहर आकर पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने किसी के खिलाफ बोलने से परहेज ही रखा। चार बार सूबे की सियासत में शिखर पहुंच चुकी मायावती सर्वसमाज के समर्थन का नारा देकर अपने भविष्य की संभावनाओं को मजबूत करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती थी।
अपने मजबूत किले में मिली करारी शिकस्त के बाद पहुंची मायावती भाईचारा और अमन का संदेश दिया। दलितों के साथ दूसरी जाती के गठजोड़ की संभावनाओं को देखते हुए मायावती बेहद सधे अंदाज में समझाती हुई नजर आई।
उनकी बातों से एक बात साफ है कि दरकती जमीन को संभालने के लिए मायावती अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले से छेड़छाड़ नहीं चाहती। यही कारण है कि पूरे बवाल, जातिय हिंसा और पीड़ितों के अन्याय का ठीकरा अधिकारियों के सिर पर फोड़कर पूरी प्रदेश सरकार की घेराबंदी कर डाली।
बसपा को मजबूत करने के लिए एक झंडे के नीचे आकर जयंती सहित अन्य कार्यक्रमों को करने का आह्वान भी किया। जातिय हिंसा की आग मे सुलग रहे सहारनपुर के शब्बीरपुर में मंगलवार को करीब दो सौ किलोमीटर लंबा सफर तयकर पहुंची बसपा सुप्रीमो मायावती की निगाहें दलितों पर टिकी थी और निशाना दूसरी जतियों को साधने पर भी था।
पीड़ित परिवार से मुलाकात के बाद मंच पर पहुंची बसपा सुप्रीमो की भाषा बेहद सधी हुई रही। दलितों को धैर्य रखने की नसीहत देकर दूसरी जातियों को रिझाने की भरपूर कोशिश की।
इसमें किसी पर आरोप-प्रत्यारोप करने की बजाय पूरे बवाल का ठीकरा पहले डीएम-एसएसपी के जरिए प्रशासन पर फोड़ा। उन्होंने अपने शासनकाल की याद भी दिलाई और सरकार पर नफरत फैलाने का आरोप लगाकर बसपा की किलेबंदी मजबूत की।