संवाद न्यूज एजेंसी
चिलकाना। पटनी गांव की लोदीकालीन बावड़ी पिछले कुछ दिनों से सुर्खियों में है। इसकी वजह है कि हिंदू संगठनों की तरफ से कुछ दिन पहले जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर इसके आसपास से कब्जा हटवाने की मांग की गई। बावड़ी का क्या इतिहास और किस तरह से लोगों ने कब्जा कर रखा है, इसे लेकर बृहस्पतिवार को पड़ताल की गई।
इसमें सामने आया कि वक्त के साथ इसका अस्तित्व खत्म होता जा रहा है। बावड़ी पर लोगों ने कब्जा करके कूड़े के ढेर लगा दिए हैं। ऐसे में बावड़ी को तलाशना भी कठिन है।
दरअसल, जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर गांव पटनी में यह बावड़ी बनी है। बावड़ी के निर्माण में चूना, लखोरी तथा पिंजोरी ईंटों का प्रयोग हुआ है। बावड़ी में अंदर जाने के लिए सीढ़ियां हुआ करती थी। बावड़ी के अंदर दोनों तरफ मकान बने थे। सीढि़यों से नीचे उतर कर सबसे अंत में एक कुंआ बना था। बताते हैं कि एक समय में कुएं में पानी भरा रहता था, जिसका प्रयोग पेयजल के लिए होता था। अंतिम छोर पर दो सुरंग भी बनी हुई थी।
इनमें से एक सरसावा तथा दूसरी सुलतानपुर की तरफ जाती थी। वर्तमान में बावड़ी पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। गांव के लोगों ने बावड़ी के स्थान पर कूड़ा डालकर इसे पूरी तरह ढक दिया है। पटनी गांव की ऐतिहासिकता का इस बात से भी पता चलता है कि यहां खोदाई के दौरान खेतों में पुरानी ईंटें मिलती रही हैं। कुछ वर्ष पहले एक देवी की मूर्ति भी खोदाई के समय मिली थी, जो गुफा के मंदिर में रख दी गई थी।