सहारनपुर के देवबंद में बच्चों की पैदाइश को लेकर मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की की है। टेस्ट ट्यूब बेबी समेत बहुत से ऐसे इलाज हैं जिनके जरिये नि:संतान दंपति औलाद का सुख प्राप्त कर रहे हैं।
लेकिन जमीयत उलमा-ए-हिंद की गुजरात में हुई बैठक में लंबी चर्चा के बाद इस तरीके से पैदा हुई संतान को नाजायज करार दिया गया है। इस संबंध में बाकायदा छह प्रस्ताव पारित किए गए हैं।
बैठक में शामिल हुए देश के प्रमुख उलमा ने साफ शब्दों में कहा कि इस्लाम सिद्धातों के हिसाब से इसको प्रोत्साहित नहीं करता है। बैठक में छह प्रस्ताव पारित कर सरोगेसी और टेस्ट ट्यूब बेबी की विस्तार से व्याख्या करते हुए इस प्रक्रिया को शरीयत के नजरिये से नाजायज कहा गया है।
पारित प्रस्तावों में कहा गया कि अगर पति किसी अजनबी पुरुष और दूसरी महिला के शुक्राणु व अंडाणु को पत्नी के गर्भ में स्थानांतरित कराए और उसी से शिशु का जन्म हो तो ऐसा करना हराम है। बच्चे का वंश उन्हीं मियां बीवी से साबित होगा जिनके शुक्राणु व अंडाणु इस्तेमाल किए गए हैं।
बच्चे का वंश तो पिता से साबित होगा, लेकिन असली मां वही कहलाएगी जिसके गर्भ से उसने जन्म लिया है। मदरसा जामिया उलूमुल कुरान जंबोसर, गुजरात में हुई जमीयत उलमा-ए-हिंद की इस बैठक में दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी बनारसी, जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना कारी उस्मान मंसूरपुरी, महासचिव मौलाना महमूद मदनी, दारुल उलूम के मुफ्ती-ए-आजम मुफ्ती हबीबुरर्हमान खैराबादी, मजलिस-ए-शूरा के सदस्य मौलाना रहमतुल्ला कश्मीरी, मुफ्ती अहमद खानपुरी समेत देश के प्रमुख उलमा ने हिस्सा लेते हुए इन प्रस्तावों पर मुहर लगाई।