-हेल्पलाइन से रोजेदार शरीयत की रोशनी में शंकाओं को कर रहे दूर
संवाद न्यूज एजेंसी
देवबंद। जमीयत दावतुल मुसलीमीन के संरक्षक व प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन मौलाना कारी इस्हाक गोरा ने कहा कि रमजान सिर्फ भूखा प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि यह अपने गुस्से, बुरी आदतों और झगड़ों पर काबू पाने की तालीम भी देता है। हदीस में आया है कि पैगंबर मोहम्मद साहब ने फरमाया कि अगर कोई रोजे की हालत में तुमसे झगड़ा करे तो कह दो कि मैं रोजे से हूं।
सवाल: अंबहेटा निवासी जर्रीन ने पूछा कि उनके मोहल्ले की कुछ महिलाएं कहतीं हैं कि रोजे की हालत में मां अपने बच्चे को दूध नहीं पिला सकती, क्योंकि इससे रोजा टूट जाता है। क्या यह सही है।
जवाब:
नहीं, यह धारणा गलत है। शरीयत के अनुसार रोजे की हालत में मां बच्चे को दूध पिला सकती है और इससे रोजा नहीं टूटता।
सवाल:
कस्बा तीतरो से आसिफ ने पूछा कि वह रोजे की नीयत रात में ही दिल में कर लेते थे, लेकिन आज सहरी में उनकी आंख नहीं खुली, जिससे वे सहरी में नीयत नहीं कर पाए। क्या उनका रोजा होगा।
जवाब:
शरीयत के अनुसार नीयत का मतलब इरादा करना है, जुबान से कहना जरूरी नहीं। यदि कोई व्यक्ति रात में ही रोजे की नीयत करके सो गया हो, तो उसके लिए दोबारा नीयत करना जरूरी नहीं। लगातार रोजे रखने की नीयत हो तो एक बार नीयत कर लेना काफी है।
सवाल:
सहारनपुर के खानआलमपुरा निवासी रियाज सिद्दीकी ने पूछा कि अगर किसी व्यक्ति ने गरीब को कर्ज दिया हो और बाद में उसे जकात की नीयत से माफ कर दे, तो क्या उसकी जकात अदा हो जाएगी।
जवाब:
नहीं, जकात अदा नहीं होगी। किसी को दिया गया कर्ज बाद में जकात की नीयत से माफ करने से जकात नहीं मानी जाती। जकात की रकम जकात की नीयत से किसी हकदार को देना जरूरी है।