बेहट। कालांतर में हमारी परंपराएं सिकुड़ रही हैं। त्योहार धार्मिक अनुष्ठानों से दूर हो गए हैं, जिन्होंने दिखावे और हुड़दंग का रूप ले लिया है। पहले होली पर धार्मिक अनुष्ठान हुआ करते थे, होली अब होलिका दहन और एक दूसरे पर रंग डालने तक सिमट कर रह गई है।
बदलते सामाजिक परिवेश को लेकर पंडित संजय प्रपन्नाचार्य बताते हैं कि भारतीय सनातन परंपरा में चार महापर्व ऐसे हैं, जिन्हें हर सनातन धर्मावलंबी श्रद्धापूर्वक सामूहिक रूप से मनाता है। इनमें श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, दीपावली, महाशिवरात्रि और होली पर्व शामिल हैं। पहले होली पर्व पर समाज का हर छोटा बड़ा व्यक्ति एक साथ बैठकर सामूहिक यज्ञ के माध्यम नवीन अन्न को भगवान को अर्पण कर यज्ञ अग्नि में भुने हुए चने, गेहूं, जौ की बालियों को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। कालांतर में अनेक कारणों से यही परंपराएं सिकुड़ते-सिकुड़ते होलिका दहन, एक दूसरे पर रंग डालने, हुड़दंग करने तक सिमट कर रह गई है। बहुत से वैज्ञानिक, धार्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक लाभ हमारे सनातन पर्वों में छिपे हैं।
इस तरह मनाएं पर्व
इस बार 24 मार्च रविवार को भद्रा काल के पश्चात रात्रि 11:10 के बाद होलिका दहन का शुभ मुहूर्त है। होली में अग्नि प्रज्ज्वलन के समय अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए अपने दुर्गुणों के छूटने की प्रार्थना करें। भगवान के नामों का मन ही मन उच्चारण करें। होली प्रज्ज्वलन के समय किया गया नाम, जप हजारों गुणा फल प्रदान करता है। सोमवार 25 मार्च को रंगोत्सव मनाएं।