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जन सामान्य को सौंपे शाकंभरी देवी का आधिपत्य:महामंडलेश्वर

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संवाद न्यूज एजेंसी
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बेहट (सहारनपुर)। पंच दशनाम जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरि ने कहा कि प्राचीनतम एवं शक्ति का जागृत केंद्र मां शाकंभरी देवी सिद्धपीठ सभी प्रकार की सुविधाओं से उपेक्षित है। आज पूरे देश में तीर्थ स्थल रोल मॉडल हो रहे हैं। उन्हीं की तरह यहां का विकास भी होना चाहिए। इसलिए राज परिवार माता शाकंभरी देवी का आधिपत्य जन सामान्य को सौंप दें।
महामंडलेश्वर माता शाकंभरी देवी के दर्शन करने के बाद बेहट में भाजपा नेता संजीव कर्णवाल के आवास पर पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे। उन्होंने कहा यह शक्तिपीठ मां भगवती का साक्षात जीवंत स्वरूप है। किसी काल में राज परिवार को यह व्यवस्था दी गई होगी कि वह मां की सेवा करें। राज परिवार मां का मालिक नहीं हो सकता, सेवक हो सकता है। राजवंश यदि ये कहता है कि यह हमारी कुलदेवी है या हमारा मंदिर है, तो जिस समय राजवंश पैदा भी नहीं हुआ होगा, देवी तो तब से वहां प्रतिष्ठित है। वह राज परिवार से अपील करते है कि वह स्वत: ही अपना आधिपत्य छोड़कर सर्व समाज के लिए इसे छोड़ दें। उन्होंने कहा कि सिद्धपीठ सभी प्रकार की सुविधाओं से वंचित है। यदि राजपरिवार माता के मंदिर से अपना आधिपत्य नहीं छोड़ता, तो प्रदेश सरकार इसे अधिकृत कर विकास करें। ताकि यहां यात्रियों को सुविधाएं मिल सकें। उन्होंने कहा कि उप्र सरकार पत्थरबाजों और दबंगों पर कार्रवाई कर दंड के विधान का पालन कर रही है।
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वंश हीनता से बचे राजपरिवार
महामंडलेश्वर ने कहा कि जिस प्रकार से मंदिर में लाखों का चढ़ावा आता है, उनका मानना है कि राज परिवार को मंदिर का चढ़ावा मंदिर और सनातन हिंदू संस्कृति के विकास में लगाना चाहिए था। शास्त्रों में लिखा है कि यदि कोई भी व्यक्ति या परिवार मंदिर का चढ़ावा मंदिर के उद्देश्यों में न लगाकर उसे व्यक्तिगत भोग विलास में लगाता है, तो ऐसा परिवार वंशहीन हो जाता है।
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कुरान की कुछ आयतें धर्म का हिस्सा नहीं
महामंडलेश्वर ने कहा कि भारत में हिंदू और मुसलमान दोनों को सोचना पड़ेगा, क्योंकि दोनों को साथ रहना है। मिलकर रहेंगे, तो अमन चैन और खुशहाली रहेगी। कहा कि कुरान की कुछ आयतों को दिल्ली की पटियाला कोर्ट ने भी धर्म का हिस्सा नहीं माना। इस्लामिक विद्वानों को भी आगे आना चाहिए और कहना चाहिए कि जो नफरत फैलाने वाली बातें हो, जो इंसान-इंसान में भेद करने वाली बातें हो, उनको धर्म का अंग नहीं मानना चाहिए।
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