मेला गुघाल परिसर में नाले से गायब ढक्कन।
सहारनपुर। मेला गुघाल दो सितंबर से शुरू हो रहा है। मेला गुघाल परिसर के लिए 3.8 करोड़ रुपये से अधिक का ठेका छोड़ा गया है, जबकि जाहरवीर गोगाजी की म्हाड़ी की बोली 25.30 लाख रुपये में छोड़ी गई है। यानी मेले के नाम पर नगर निगम करोड़ों रुपये ले रहा है, लेकिन म्हाड़ी स्थल और मेला गुघाल स्थल पर व्यवस्थाएं बदहाल हैं। इसे लेकर पड़ताल की गई तो कुछ ऐसी ही स्थिति नजर आई।
मेला गुघाल उत्तर भारत के प्रमुख मेलों में से एक है। यहां गंगोह रोड स्थित जाहरवीर गोगाजी महाराज की म्हाड़ी पर मेले के दौरान प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु पहुंचकर निशान चढ़ाते हैं। मेला दो सितंबर से शुरू हो रहा है। पहले तीन दिन में श्रद्धालुओं की सर्वाधिक भीड़ उमड़ती है। म्हाड़ी स्थल की पड़ताल की गई तो तमाम चीजें दुरुस्त मिली, लेकिन बुनियादी जरूरत की सुविधाएं बदहाल नजर आई। पेयजल के लिए लगी टंकियों में पानी नहीं था। स्थानीय लोगों ने बताया कि बिजली आने पर ही पानी आता है। परिसर में बने पिंक शौचालय पर ताला जड़ा मिला। बिजली के खंभों के नीचे पॉलिथीन नहीं लगाई गई है। इससे बरसात आदि के दौरान खंभे में करंट आने का खतरा है।
उधर, मेला गुघाल स्थल पर भी बदहाली नजर आई। मेला परिसर की लक्कड़ मंडी वाली सड़क का फुटपाथ जगह-जगह से टूटा मिला। नाले का ढक्कन भी गायब है। फुटपाथ पर कीचड़ और मिट्टी पड़ी मिली। इसी मार्ग की नाली जगह-जगह से टूटी पड़ी है, जिसमें कीचड़ जमा है और मच्छर पनप रहे हैं। पीछे की सड़क की सीवर का ढक्कन टूटा मिला। बड़ी बात मेन गेट के पास लगे हाईमास्ट लाइट के खंभे के नीचे कनेक्शन बॉक्स खुला पड़ा है। हाईमास्ट लाइट के खंभे के साथ ही अन्य खंभों पर भी नीचे प्लाटिक लपेटने की जरूरत है, जिससे करंट आदि न आए।
800 साल पुराना है गोगा म्हाड़ी मेले का इतिहास
जाहरवीर गोगा की म्हाड़ी पर लगने वाला तीन दिवसीय मेला 26 छड़ियाें के पहुंचने पर शुरू होता है। इस मेले का इतिहास 800 साल से भी अधिक पुराना है। राजस्थान के बागड़ के बाद यहीं सबसे बड़ा मेला लगता है। बाबा श्री जाहरवीर ने कबली भगत को नेजा दिया था, तभी से मेला भरता आ रहा है, जिसमें लाखों श्रद्धालु प्रसाद और निशान चढ़ाने पहुंचते हैं। प्रत्येक वर्ष शुक्ल पक्ष की दशमी पर लगने वाले मेले में विभिन्न क्षेत्रों से ढोल और बैंडबाजों के साथ 26 छड़ियां नेजे की अगुवाई में मेला गुघाल परिसर स्थित श्री विश्रामपुरी काल भैरव मंदिर पहुंचती हैं और यहां से पूजन के बाद गोगा म्हाड़ी की ओर प्रस्थान करती हैं। तीसरे दिन छड़ियां इसी रास्ते से लौट जाती हैं। इन तीन दिनों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तराखंड़, राजस्थान और दिल्ली से लाखों श्रद्धालु निशान और प्रसाद चढ़ाने पहुंचते हैं।