सहारनपुर। फसल अवशेषों को जलाने से रोकने के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक किसानों को विकल्प सुझा रहे हैं। कृषि वैैैज्ञानिक पराली, गन्ने की पत्तियों और सरसों के अवशेषों के भूसे का कंपोस्ट बनाकर उस पर मशरूम की खेती के लिए जोर दे रहे हैं। इससे न सिर्फ फसल अवशेषों को जलाने पर अंकुश लगेगा, बल्कि इसका उपयोग मशरूम उत्पादन में किया जा सकता है।
फसल अवशेषों के भूसे से बनने वाली कंपोस्ट पर मशरूम उत्पादन किया जा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक किसानों को इस बारे में जागरूक कर रहे हैं। केवीके के प्रभारी और मशरूम विशेषज्ञ डॉ. आईके कुशवाहा ने बताया गेहूं, पराली, गन्ना की पत्तियों, सरसों, मूंग, उड़द आदि के फसल अवशेषों का उपयोग मशरूम उत्पादन के लिए किया जा सकता है। इसके लिए फसल अवशेषों को टुकड़ों में काटकर पहले निर्जलीकृत किया जाता है। इस कटे फसल अवशेषों को 20 से 30 दिनों तक रखकर इसका कंपोस्ट तैयार किया जाता है। ढिंगरी और मिल्की मशरूम के उत्पादन के लिए फसल अवशेष के 10 किलो भूसे में सौ लीटर पानी, 125 मिलीलीटर फार्मलीन और सात ग्राम कार्बेंडजियम की मात्रा को मिलाया जाता है। जबकि सफेद बटन मशरूम के लिए कंपोस्ट को बनाने के लिए पहले भूसे को सड़ाया जाता है, इसमें जिप्सम, चौकर, उर्वरकों आदि को भी मिलाया जाता है। इसके बाद इस कंपोस्ट पर मशरूम का स्पान बीज डालकर उत्पादन लिया जा सकता है। इससे न सिर्फ फसल अवशेषों को जलाने से होने वाला पर्यावरण का नुकसान पर रोक लगेगी, बल्कि इसकी कंपोस्ट को पैकेज में रखकर मशरूम की खेती करके किसान मुनाफा भी कमा सकता है। कृषि विज्ञान केंद्र इसके लिए किसानों को जागरूक कर रहा है।
जनपद में होता है वर्षभर मशरूम उत्पादन
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डॉ.आईके कुशवाहा ने बताया कि जनपद में पूरे वर्ष मशरूम का उत्पादन होता है। सफेद बटन मशरूम की खेती अक्तूबर से फरवरी तक, मिल्की मशरूम की खेती जून से सितंबर तक और ढिंगरी मशरूम का उत्पादन मार्च से मई तक होता है। एक वर्ष में इसकी तीन फसल ली जा सकती है।