दुष्यंत कुमार के बचपन के साथी सत्य कुमार बताते हैं कि भोपाल से जब लंबा सफर तय कर गांव राजपुर नवादा आया करते थे तो अपनी पुरानी फिएट कार लेकर आते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि मैं अपनी पुरानी फिएट कार का शुक्रगुजार हूं, जिसने रास्ते के सारे मिस्त्री मेरे मित्र बना दिए हैं। बेचारे मेरी फिएट कार दुरुस्त करते हैं और चाय भी पिलाते हैं। इतना ही नहीं उनके बीच रुक कर मैं जो कुछ भी महसूस करता हूं घर आने के बाद उसे गजलों में ढाल देता हूं। यकीनन इसी सोच ने दुष्यंत कुमार को देशवासियों के दिलों में स्थान दिलाया।
भावुकता भरे शब्दों में वयोवृद्ध सत्य कुमार त्यागी फरमाते हैं दुष्यंत कुमार अक्सर गंगा स्नान को जाया करते थे हालांकि उनके पास ट्रैक्टर, कार सब कुछ थे। लेकिन बैलगाड़ी उन्हें प्रिय थी। एक दिन पूर्व गंगा स्नान के लिए गंगा तट पहुंचते तब्बू लगाते और संगी-साथियों के साथ गंगा स्नान का लुत्फ उठाते।
सत्य कुमार कहते हैं कि पिता की जब मृत्यु हुई उस वर्ष भी उन्होंने गंगा स्नान के अपने दायित्वों को पूरा किया। दुष्यंत कुमार की पंक्तियां हौले-हौले पांव हिलाओ, जल सोया है छेड़ो मत/हम सब अपने-अपने दीपक यहां सिराने आएंगे...आज भी दुष्यंत के बाल सखा सत्य कुमार त्यागी याद कर भावुक हो जाते हैं।
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता /एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों.., मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही/हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए.., सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं/मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.. यह वह पंक्तियां हैं जो गजलकार दुष्यंत कुमार की गंभीर सोच की कसौटी पर खरा उतरती हैं।
मेरा सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा/मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा..,हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए/इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.. महान साहित्यकार दुष्यंत कुमार की वह सदाबहार पंक्तियां जो आमजन की जुबान से गुनगुनाए जाते हैं।