दारुल उलूम के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी बताते हैं कि जब वर्ष 1866 में दारुल उलूम की स्थापना हुई, उस समय तक कोई नहीं जानता था कि यह इदारा एशिया में इस्लामी तालीम का प्रमुख केंद्र बनेगा। संस्था पर शुरुआती दौर में किसी प्रकार का कोई बजट नहीं होता था। धीरे-धीरे यहां तालीम हासिल करने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। जिसके चलते शहर के लोगों ने छात्रों को भोजन कराने की जिम्मेदारी ली और यह सिलसिला 40 वर्षों तक चला।
कभी नहीं ली सरकारी मदद
दारुल उलूम स्थापना के समय से ही अपने उसूलों पर चल रहा है। उस समय इसके संस्थापकों ने निर्णय लिया था कि संस्था को चलाने के लिए किसी भी प्रकार की सरकारी मदद नहीं ली जाएगी। बल्कि यह कौम के चंदे से चलेगा। तब से लेकर आज तक दारुल उलूम का पूरा निजाम (व्यवस्था) चंदे पर ही निर्भर है। देश में चलने वाली कई सरकारों ने दारुल उलूम को सरकारी मदद देने का प्रयास किया, लेकिन संस्था ने कभी भी इसमें सरकारी हस्तक्षेप नहीं रखा।
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