सहारनपुर। गर्भावस्था में महिलाओं को पौष्टिक आहार न मिलने और ठीक से देखभाल न होने का शिशुओं पर असर पड़ रहा है। जिला महिला अस्पताल में हर तीसरे शिशु का वजन कम निकल रहा है। डॉक्टरों के अनुसार, शिशु का वजन 2.5 से 2.8 किलोग्राम होना चाहिए, जबकि शिशुओं का वजन 2.5 किलोग्राम से भी कम आ रहा है।
जिला महिला अस्पताल 110 बेड का है। यहां प्रतिदिन 20 से 30 के बीच प्रसव होते हैं। इनमें ऑपरेशन के साथ ही सामान्य भी शामिल है। जो शिशु समय से पहले या फिर जिनका वजन 2.5 या फिर उससे कम होता है, उन्हें रखने के लिए (नवजात शिशु देखभाल इकाई) एसएनसीयू वार्ड है। फिलहाल एसएनसीयू नई बिल्डिंग में बने पीकू वार्ड में संचालित हो रहा है। यहां 14 बेड है, जिन्हें वार्मर कहते हैं। एसएनसीयू में रोजाना 15 से 20 शिशु आते हैं। इनमें से चार से पांच बच्चों को भर्ती करना पड़ता है।
डॉक्टरों के अनुसार, कोरोना काल के बाद शिशुओं की संख्या में इजाफा हुआ है, जबकि कोरोना से पहले भर्ती की संख्या दो से तीन रहती थी। गर्भावस्था में महिलाओं को फाइबर युक्त आहार न लेना, आयरन की कमी के वजह से शिशुओं का कमजोर होना है। ऐसे शिशुओं को निमोनिया व डायरिया की बीमारी आसानी से हो जाती है। एसएनसीयू के आंकड़े बताते हैं कि हर तीसरा शिशु का वजन 2.5 से कम निकल रहा है।
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कम वजन वाले बच्चों में सबसे ज्यादा खतरा ऑक्सीजन लेवल कम होने का रहता है। इसके अलावा बुखार, निमोनिया, पीलिया का खतरा रहता है। समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में भी कम वजन की समस्या रहती है। एसएनसीयू में रोजाना चार से पांच शिशु भर्ती होते हैं।
-डॉ. मनदीप सिंह, बाल रोग विशेषज्ञ, महिला अस्पताल