सहारनपुर में मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया। यह पंक्तियां संकल्प विकलांग केंद्र की संचालिका रेेेखा कुमार के जीवन पर सटीक बैठती हैं।
रेखा ऐसी महिला हैं, जिन्होंने दिव्यांग बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जीवन के 21 साल लगा दिए। उनके प्रयास अब भी जारी हैं। इन 21 सालों में कई बार ऐसा हुआ, जब दिव्यांग बच्चों की वजह से वह अपने बच्चों को पूरा समय नहीं दे सकीं।
आज उनके बच्चे ऑस्ट्रेलिया में रह रहे प्रणव और बंगलूरू में रह रहे राघव भी इस मिशन में कंधे से कंधा मिलाकर उनके साथ हैं। समाज के अन्य लोग भी अभियान को सफलता की ओर ले जाने में सहयोग कर रहे हैं, इनमें कई आईएएस, आईपीएस और पीसीएस अफसर भी शामिल हैं।
चंद्रनगर निवासी रेखा मुंबई यूनिवर्सिटी की छात्रा रही हैं। उन्होंने वहां से 1976 में एमएससी किया। उनकी शादी सहारनपुर निवासी डॉ. राकेश कुमार के साथ हुई। एक दिन उन्हें एक दंपति मिला, जो अपने बच्चे को लेकर काफी परेशान था। रेखा से उनकी हालत देखी नहीं गई।
उन्होंने इस बात को अपनी मित्र संगीता वर्मा और अनुभा भारती को बताया। साथ ही ऐसे बच्चों के लिए कुछ करने की ठानी। उन्होंने इसका जिक्र अपने पति डॉ. राकेश से किया तो उन्होंने भी सपोर्ट किया।
इसके बाद उन्होंने वर्ष 1994 में हकीकतनगर में संकल्प नाम से विकलांग केंद्र खोला। यहां मानसिक कमजोर और बधिर बच्चों को रखकर उनको शिक्षित करना शुरू किया।
संकल्प केंद्र के पास अपना भवन नहीं था। ऐसे में रेेखा के ससुर ब्रिगेडियर पीपी कुमार ने भवन निर्माण के लिए धन दिया। 21 साल में संकल्प केंद्र से कई हजार दिव्यांग बच्चे हुनरमंद और शिक्षित बनकर निकल चुके हैं, जो समाज में सम्मान के साथ जीवन-यापन कर रहे हैं।
बकौल रेखा, कई मामलों में कुछ पैरेंट्स ऐसे बच्चों को साथ रखना नहीं चाहते। ऐसे बच्चों को संस्था स्वीकार करती है। यहां पैरेंट्स से बिना कोई सहयोग लिए नि:स्वार्थ भाव से बच्चे का मानसिक विकास किया जाता है।
वर्तमान में 60 से अधिक बच्चे केंद्र से जुड़े हुए हैं। अनेक ऐसे हैं, जिनको घर से लाने और घर छोड़कर आने के लिए केंद्र ही किराया चुकाता है। रेखा कहती हैं कि भले केंद्र चलाने की सोच उनकी थीं, मगर उन्हें संगीता वर्मा, अनुभा भारती, परिजनों के साथ समाज के अच्छे लोगों का पूरा सपोर्ट मिला।