सहारनपुर। हिंदी सरल शब्दों में कविताएं और सहज भाव में काव्य संग्रह लिखा। कई यूनिवर्सिटी में इनके लेखन पर शोध हो चुके हैं। ऐसे हैं डाक्टर एन सिंह। उनकी कविता लंबे समय से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई जा रही है। डॉ. एन सिंह हिंदी साहित्य के एक मजबूत हस्ताक्षर हैं, जो बीते 40 साल से हिंदी लेखन कर रहे हैं। हिंदी हैं हम अभियान के तहत प्रस्तुत है उनकी हिंदी साहित्य यात्रा पर आधारित रिपोर्ट...
डॉ. एन सिंह मूलरूप से गांव चतरसाली के रहने वाले हैं, जो तीन राजकीय महाविद्यालयों में प्राचार्य पद पर कार्यरत रह चुके हैं। दो बार माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के सदस्य भी रहे हैं। बीते 40 साल से वह कविताएं, काव्य संग्रह लिखने के साथ ही अनेक पुस्तकों का संपादन भी कर चुके हैं। वह अभी तक 32 किताबें लिख चुके हैं। अपने लेखन की बदौलत वह देश भर के अनेक अकादमियों और विश्वविद्यालयों में पुरस्कार पा चुके हैं।
पांच पीएचडी और पांच एमफिल हुईं
डॉ. एन सिंह के लेखन के स्तर का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि उनके साहित्य पर देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पांच पीएचडी हो चुकी हैं। इनमें से दिल्ली विश्वविद्यालय में दो, गढ़वाल विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और शिवाजी विश्वविद्यालय में एक-एक हुई है। इनके अलावा पांच एमफिल भी हो चुकी हैं। उनकी कविताएं केवल दिल्ली विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि लखनऊ विश्वविद्यालय, केरल और अमर कंटक विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश में भी पढ़ाई जाती हैं।
प्रमुख पुस्तकें
डॉ. एन सिंह के चार काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें सतह से उठते हुए, संभल राजपथ वरना, अंधेरों के विरुद्घ और प्रतिनिधि कविताएं शामिल हैं। रैदान ग्रंथावली दलित साहित्य एवं राजनीति, सर्वश्रेष्ठ दलित कविताएं कठौती में गंगा और सर्वश्रेष्ठ दलित कहानियां का लेखन भी उन्होंने किया है। शिखर की ओर, सुश्री मायावती और दलित चिंतन, दर्द के दस्तावेज का वह संपादन कर चुके हैं। खास यह भी है कि सतह से उठते हुए का उर्दू में और दर्द के दस्तावेज का मराठी में अनुवाद भी हो चुका है। डिजिटल पर उनकी आठ किताबें उपलब्ध हैं।
जीवन और साहित्य पर प्रकाशित किताबें
डॉ. एन सिंह के जीवन और साहित्य पर किताबें प्रकाशित हुई हैं। इनमें शब्द शब्द संघर्ष अभिनंदन ग्रंथ, डॉ. एन सिंह व्यक्तित्व एं सृजन, डॉ. एन सिंह और हिन्दी साहित्य में दलित संघर्ष उन्नयन शामिल हैं।
आकाशवाणी पर होता है प्रसारण
डॉ. एन सिंह की कविताओं का प्रसारण अनेक बार आकाशवाणी नजीबाबाद पर हो चुका है। इसके अलावा हिन्दी साहित्य को लेकर आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाली चर्चाओं का हिस्सा भी वह बनते रहे हैं।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जा रही उनकी कविता
कितनी व्यथा झरी आज तक बदली से
रोक सका है कौन अरे मधु मास को
जाने कितने टूटे हैं अहसास मगर
तोड़ सका है कौन अनसवर आस को
मत ठोकर खाकर ठहर पथिक पथ शेष है
हर ठोकर अहसास आभास है तेरी मंजिल का
शंकित हो मत बैठ पुल पर ओ माझी
तेरी यह पतवार रूप है साहिल का।