कुत्ते हो चुके खूंखार, हर माह 3000 शिकार
सहारनपुर। कुत्ते लगातार हमलावर हो रहे हैं। देहात के साथ ही शहर में भी कुत्तों के हमलों की घटनाएं बढ़ रही हैं। एसबीडी जिला अस्पताल में रोजाना 50 से 55 लोग कुत्ता काटे के पहुंच रहे हैं। जिले की बात करें तो जिला अस्पताल के साथ ही तमाम सीएचसी और पीएचसी पर हर माह कुत्ता काटने के 3000 से अधिक मामले पहुंचते हैं।
जिला अस्पताल की 15 नंबर ओपीडी में कुत्तों के काटने के मामले पहुंचते हैं। यहां से मरीज को एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने के लिए 22 नंबर कक्ष में भेजा जाता है। जिला अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर सतीश कुमार ने बताया कि अस्पताल में एंटी रेबीज इंजेक्शन पर्याप्त मात्रा में हैं। उधर, जिले भर की सीएचसी और पीएचसी पर प्रति माह 2000 से 2200 के बीच कुत्ता काटने के मामले पहुंच रहे हैं। नागल स्थित सीएचसी पर सप्ताह में 40 से 50 मामले आते हैं। यहां सप्ताह में दो दिन मंगलवार और शुक्रवार को ही इंजेक्शन लगाए जाते हैं। बड़गांव पीएचसी पर पहुंचने वाले कुत्ता काटे के मामलों को नानौता सीएचसी भेजा जाता है। गंगोह सीएचसी पर भी सप्ताह में 30 से 40 मामले कुत्तों के हमले के पहुंचते हैं। यहां सोमवार और बृहस्पतिवार को ही इंजेक्शन लगाए जाते हैं। गागलहेड़ी स्थित सीएचसी पर प्रतिदिन 10 से 15 मामले कुत्तों के हमले के पहुंचते हैं। नकुड़ सीएचसी पर सप्ताह में 50 से 60 मामले पहुंचते हैं। सोमवार और बृहस्पतिवार को ही यहां इंजेक्शन लगाए जाते हैं। नानौता सीएचसी पर प्रतिदिन आठ से 10 मामले पहुंचते हैं। मंगलवार और शुक्रवार को एंटी रेबीज इंजेक्शन लगाए जाते हैं। सीएचसी चिलकाना में प्रतिदिन चार से पांच मामले पहुंचते हैं। रामपुर मनिहारान सीएचसी पर प्रतिदिन आठ से दस मामले पहुंचते हैं। इंजेक्शन की कभी-कभी कमी हो जाती है। अंबेहटा पीएचसी में पहुंचने वाले मामलों को नकुड़ सीएचसी पर भेजा जाता है। इस हिसाब से जिला अस्पताल और सभी सीएचसी व पीएचसी में प्रति माह तीन से साढ़े तीन हजार मामले कुत्ता काटे के पहुंचते हैं।
नियम नहीं व्यवस्था के अनुरूप लगते हैं इंजेक्शन
कुत्तों के हमले के बाद इंजेक्शन लगने के दिन तय हैं। टिटनेस का इंजेक्शन सबसे जरूरी है। इसके बाद एंटी रेबीज का इंजेक्शन जीरो-डे यानी पहले दिन, तीसरे दिन, सातवें दिन, 14वें दिन और 28वें दिन लगना चाहिए। मगर सीएचसी और पीएचसी पर सप्ताह में मात्र दो दिन इंजेक्शन लगाए जाते हैं। ऐसे में उक्त सीएचसी और पीएचसी पर पहले, तीसरे, सातवें, 14वें और 28वें दिन का मतलब नहीं है।
जहां कमेले, वहां अधिक मामले
शहरी क्षेत्र में नगर निगम का कमेला होने के साथ ही हर गली और मोहल्ले में मीट की दुकानें हैं। डॉ. सतीश बताते है कि ऐसे में कुत्तों को जब मांस नहीं मिलता है तो वे लोगों पर हमला करते हैं। बच्चे उन्हें सॉफ्ट टारगेट नजर आते हैं, ऐसे में वे बच्चों पर ज्यादा हमला करते हैं। शहर में हर माह 1500 से 1800 मामले कुत्तों के हमले के आते हैं। इसके अलावा गागलहेड़ी में भी कमेला है। यही वजह है कि शहर के बाद गागलहेड़ी में सबसे अधिक मामले कुत्तों के हमले के रहते हैं।
नगर निगम भी जिम्मेदार
आवारा कुत्तों पर कंट्रोल करना नगर निगम की जिम्मेदारी है। करीब दो वर्ष पहले नगर निगम ने कुत्तों की संख्या पर अंकुश लगाने के नाम पर नसबंदी अभियान चलाया था। इसके लिए एक प्राइवेट संस्था को ठेका दिया था। कुत्तों की नसबंदी पर करीब नौ लाख रुपये खर्च किए थे। मगर उसके बाद अचानक अभियान बंद कर दिया गया। वर्तमान में कुत्तों के खिलाफ कोई अभियान नहीं चल रहा है।
वर्जन
कुत्ते के काटने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। एंटी रेबीज दवा कुछ ही दिन की बची है, जिससे हम काम चला रहे हैं। दवा के लिए उच्च अधिकारियों को लिखा है। रही बात सीएचसी पर सप्ताह में दो दिन इंजेक्शन लगने की तो एक वायल दस लोगों को लगती है। ऐसे में मरीजों को एक दिन बुला लेते हैं, जिससे पूरी वायल लग जाए। कोशिश यही रहती है कि लोगों को इलाज भी मिलता रहे और दवा भी खराब ना जाए।
- डॉ. बीएस सोढ़ी, सीएमओ
सहारनपुर में देहरादून रोड घूमते कुत्ते- फोटो : SAHARANPUR