सहारनपुर में 20 दिन पहले जिला अस्पताल में गैस रिसाव की दहशत से अब तक लोग उबर भी नहीं पाए थे कि बृहस्पतिवार को दोबारा हुए क्लोरीन लीकेज से अस्पताल में मौजूद लोग खौफजदा हैं।
यह बात साफ है कि अस्पताल प्रशासन की लापरवाही से यहां बड़ा हादसा भी हो सकता था। पहले हुए लीकेज की घटना से अफसर सबक नहीं ले पाए। यही कारण रहा कि पुराने सिलेंडर का जिला अस्पताल में इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह भी चर्चा है कि इसी सिलेंडर में पहले भी रिसाव हुआ था। मगर, उस वक्त इसे नष्ट करने की बजाय अस्पताल में इसे दोबारा उपयोग किया जा रहा था।
जेवी जैन महाविद्यालय की रसायन विभाग की प्रोफेसर डा. अनुजा अग्रवाल का कहना है कि 40 से 60 पीपीएम गैस स्वसन तंत्र के लिए हानिकारक है। यह घातक गैस है। यह सांस की नली में घाव कर देती है।
जिससे समय रहते बचाव न किया जाए तो जीव की चंद मिनटों में ही मृत्यु हो जाती है। उनका कहना है कि इसके बचाव के लिए उस स्थान से जल्द लोगों को हटाना चाहिए।
वरिष्ठ फिजीशियन डा. कलीम अहमद का कहना है कि अस्पताल में क्लोरीन का उपयोग पानी को साफ करने में किया जाता है। डायरिया और इस तरह की अन्य बीमारियों के दौरान मरीजों के इलाज में इसके जरिये पानी शुद्ध कर उसे इस्तेमाल किया जाता है।
क्लोरीन की बदबू बहुत देर तक बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसकी बदबू से व्यक्ति का दम घुट सकता है। इसके अलावा इसकी ज्यादा मात्रा शरीर में रिएक्शन भी कर सकती है।
यह शरीर में एसिड तैयार कर देती है जो जानलेवा होता है। डा. अंकुर उपाध्याय का कहना है कि श्वसन तंत्र पर इसकी ज्यादा मात्रा बुरा प्रभाव डालती है और इससे फेफडे़ प्रभावित हो सकते हैं। निमोनिया का भी खतरा इससे बना रहता है।
क्लोरीन गैस के नुकसान
सांस लेने में कठिनाई
नाक, गले, त्वचा और आंख में जलन
दम घुटना
उल्टी आना
सर दर्द होना
40 से 60 पीपीएम गैस स्वसन तंत्र के लिए हानिकारक
6400 पीपीएम अत्यंत घातक