सहारनपुर। पांवधोई नदी के पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए बायोरेमेडिएशन विधि अपनाई जा रही है। बीते एक साल में दो करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन पानी की गुणवत्ता में सुधार नजर नहीं आ रहा है। पानी की हर महीने कराई जा रही जांच भी सवालों के घेरे में है।
पांवधोई नदी शहर के बीच से होकर गुजरने वाली नदी है, जिसमें शहर भर के सीवर और नाले छोड़े गए हैं। नदी के प्रदूषित होने की वजह से वर्ष 2024 में एनजीटी नगर निगम को नोटिस दे चुका है। एनजीटी से बचने को ही नगर निगम ने बायोरेमेडिएशन विधि को अपनाया है। बायोरेमेडिएशन के लिए नगर निगम हर महीने कंपनी को 20 लाख रुपये से अधिक का भुगतान कर रहा है। बीते करीब एक साल में दो करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान हुआ है, लेकिन नदी की हालत में सुधार नजर नहीं आ रहा है। केवल कागजों में ही नदी के पानी की हालत सुधरी बताई जा रही है।
उधर, निगम के अधिकारी और कंपनी का मजबूत पक्ष है कि आईआईटी रुड़की की लैब से कराई जा रही जांच नदी के पानी की गुणवत्ता में सुधार है, जबकि जांच प्रक्रिया खुद सवालों के घेरे में है। जांच बेशक आईआईटी रुड़की की लैब कर रही हो, लेकिन पानी का सैंपल ठेका कंपनी के कर्मचारी ही लैब को भेजते हैं। यानी अपने काम की जांच खुद कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या वास्तव में पांवधोई नदी का ही पानी लैब भेजा जाता है यह जांच का विषय है, क्योंकि सैंपल भेजने की जिम्मेदारी जिन्हें दी गई है उनकी छवि पर पहले से दाग है।
यह है बायोरेमेडिएशन
बायोरेमेडिएशन एक पर्यावरणीय प्रक्रिया है, जिसमें दूषित मिट्टी और पानी को साफ करने के लिए सूक्ष्म जीवों (जैसे बैक्टीरिया और कवक) का उपयोग किया जाता है। यह जीव प्रदूषकों को कम हानिकारक या गैर-विषाक्त पदार्थों में तोड़ देते हैं, जिससे पर्यावरण को बहाल करने में मदद मिलती है।
पांवधोई नदी के पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए बायोरेमेडिएशन किया जा रहा है। पानी के सैंपल कंपनी के कर्मचारी ही लैब में पहुंचाते हैं। रिपोर्ट संतोषजनक आ रही हैं।
- पुरुषोत्तम कुमार, महाप्रबंधलक, जलकल अनुभाग, नगर निगम।