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Saharanpur: बाबा तेरी गंगा मैली हो गई, नालों की गंदगी ढोते-ढोते..., अभियान चले पर नतीजा शून्य

Thu, 30 Nov 2023 01:42 PM IST
मेरठ ब्यूरो विनीत तोमर, अमर उजाला, सहारनपुर

सार

सहारनपुर की पांवधोई नदी में कभी स्वच्छ जलधारा बहती थी लेकिन वर्तमान में नदी में गिरते नालों और गंदगी ने इसके अस्तित्व को ही बिगाड़ कर रख दिया हैं। इसकी मूल रूप में वापस लाने के अभियान भी चले लेकिन नतीजा शून्य रहा। पढ़ें ये खास रिपोर्ट।
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पांवधोई नदी - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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मैं पांवधोई नदी किसी जमाने में गंगा मैया का स्वरूप थी। स्वच्छ जल की कलकल से मैं भी इठलाती-इतराती थी। मेरे प्रति श्रद्धालुओं में अटूट आस्था थी। श्रद्धालुओं की आस्था को देखकर मेरे दिल को भी सकुन मिलता था। मेरी गोद में इतना स्वच्छ जल बहता था कि श्रद्धालुओं को अपनी परछाई दिखाई दे जाती थी, लेकिन समय का पहिया ऐसा घुमा कि मेरा रंग काला पड़ गया। अब तो नालों का काला पानी और लोगों के आंगन से निकला कूड़ा जब मेरे ऊपर डाला जाता है तो मैं खुद को बेबस और लाचार महसूस कर आंखें बंद कर लेती हूं। तब मन में एक ही ख्याल आता है बाबा तेरी गंगा मैली हो गई, नालों की गंदगी और घरों को कूड़ा ढोते-ढोते...। यह दर्द भरी आत्मकथा है गंगा मैया का स्वरूप मानी जाने वाली पांवधोई नदी की, जो आज तिल-तिलकर दम तोड़ रही है।
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गंदे नाले और कूड़े-करकट ने बिगाड़ दिया मेरा स्वरूप
किसी जमाने में मैं भी गर्व करती थी कि इतनी स्वच्छ हूं कि श्रद्धालु मुझे पूजते हैं, लेकिन मौजूदा दौर मेरे लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। गंदे पानी के नाले, घरों से निकले शौचालयों के पाइप और कूड़े-करकट ने मेरा स्वरूप ही बदल दिया। कभी स्वच्छता पर गर्व था, लेकिन आज स्वच्छ पानी काला हो गया। अपना बदला हुआ स्वरूप देखकर पीड़ा तो बहुत होती है, लेकिन कर क्या सकती हूं आला हाकिमों के भरोसे जो हूं।

कुछ अधिकारियों ने दिखाई दिलचस्पी, मैं भी हुई गदगद
साल 2008 का दौर था, जब जिले के मुखिया के तौर पर आलोक कुमार आए थे। मुझे बड़ी खुशी हुई थी कि उन्होंने मेरी सुध ली और गंदे नाले और कूड़ा-करकट डालना बंद कराया। मेरे किनारे बसे लोगों की निगरानी कमेटी बना दी गई थी।

मैं भी निर्मल हुई। इसके बाद पूर्व मंडलायुक्त सीपी त्रिपाठी, पूर्व नगरायुक्त नीरज शुक्ला और पूर्व नगरायुक्त ज्ञानेंद्र सिंह ने भी प्रयास किए, लेकिन मेरी खुशी ज्यादा नहीं टिक सकी। अधिकारी यहां से चले गए और मेरा स्वरूप फिर से बिगड़ गया। इसके बाद किसी ने सुध नहीं ली। अब तो बस इसी आस में हूं कि शायद कोई आला हाकिम आकर मुझे गंदगी के वास से बाहर निकालेगा।
 
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पांवधोई नदी में गिर रहे शहर के नाले - फोटो : Amar Ujala
पांवधोई को कहते थे स्पर्श गंगा
पांवधोई बचाव समिति के उप सचिव व जेवी जैन कॉलेज के रिटायर भूगोल विभागाध्यक्ष डॉ. पीके शर्मा के अनुसार, यह पर्वतपदीय क्षेत्र है। शकलापुरी के पास भूमिगत जलधारा निकलती है। मान्यता है कि करीब 300 साल पहले सिद्ध पुरुष बाबा लालदास व हाजी शाह कमाल ने अपने तपोबल से उस जलधारा को सहारनपुर की तरफ प्रवाहित किया था, जिसे पांवधोई नदी का नाम दिया गया था।

इसे स्पर्श गंगा भी कहते थे। जो करीब सात किलोमीटर लंबी है और बाद में ढमोला नदी में आकर मिल जाती है। बाबा के अलावा इस नदी में काफी श्रद्धालु स्नान कर मां गंगा की आरती करते थे। उस समय इतना साफ पानी होता था कि यदि उसमें सिक्का भी गिर जाए तो वह दिखाई देता था।

किसी भी नदी को स्वच्छ करने के लिए दीर्घकालीन योजना होती है। जिसका परिणाम कई साल बाद जाकर मिलता है। फिलहाल कई सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट पर काम चल रहा है। जिसका साफ पानी नदी में छोड़ा जाएगा। पांवधोई को स्वच्छ करने का परिणाम भी सामने आएगा। आम जनता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। - डाॅ. हृषिकेश भास्कर यशोद, मंडलायुक्त
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