बड़गांव। बच्चों की खुशियों के लिए एक मां सारी दुनिया जहां के सब दर्द सहती है। उसके जैसा दुनिया में कोई नहीं हो सकता है। बड़गांव क्षेत्र के नयागांव निवासी हवलदार शहीद वेदप्रकाश की वीरांगना मिथलेश इसकी एक मिसाल बनी हैं। पति के न रहने पर इकलौते बेटे के पिता को लेकर मासूम सवालों से सीने में उठते दर्द को छिपाते हुए उन्होंने उसकी अच्छी परवरिश की। आज बेटा एमबीए करने के बाद दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में नौकरी कर रहा है।
हवलदार वेदप्रकाश वर्ष 2003 में जम्मू-कश्मीर में चल रहे ऑपरेशन रक्षक के दौरान बलिदान हो गए थे। तब उनका सात वर्षीय बेटा विकास कक्षा दो में पढ़ रहा था। उस वक्त विकास को नहीं पता था कि पिता का साथ हमेशा के लिए छूट गया है। मिथलेश बताती है कि बेटा पूछता था कि मम्मी…पापा कहां गए हैं। कब आएंगे, वो कैसे दिखते हैं, बहादुर फौजी हैं न वो, बिलकुल ऐसे ही हैं न, जैसे इस तस्वीर में दिखते हैं, जैसा आप बताती हो। हमारे साथ क्यों नहीं रहते हैं। यह सवाल उस वक्त उन्हें काफी दर्द देते थे, लेकिन वह उस दर्द को छिपाते हुए चेहरे पर जबरन मुस्कान लाकर मासूम बेटे की पिता को लेकर पैदा हुई जिज्ञासा शांत करती थी ताकि उसे कोई आघात न पहुंचे। वह झूठ बोलकर दिलासा देती कि उसके पिता बहादुर फौजी हैं। फौज से उनको छुट्टियां नहीं मिल रही।
वक्त के साथ बेटे को पता चला कि मां ही पिता की भूमिका में हैं। मिथलेश बताती है कि उसने मां और पिता दोनों का प्यार बेटे को दिया है। बेटा विकास राणा कहता है कि वह अपनी मां का कर्ज कभी नहीं चुका सकता है। उसके लिए उसकी मां ही पूरी दुनिया है।