सहारनपुर। काष्ठ कला के लिए प्रसिद्ध जनपद बदलते दौर में नित नए विकल्पों की तलाश कर रहा है। पहले आम, शीशम आदि लकड़ियों से वुडन हैंडीक्राफ्ट उत्पाद बनाए जाते थे। इन पर हाथों से नक्काशी होती थी। उद्योग में नियमों की पाबंदी लगी तो उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी भी बदल गई। अब बबूल की लकड़ी से उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, जो अधिक टिकाऊ भी है, जिसके आर्डर विदेशों से मिल रहे हैं। इससे निर्यात को बढ़ावा मिला है।
पहले लकड़ी के उत्पाद बनाने के लिए ज्यादातर कारोबारी आम और शीशम की लकड़ी का इस्तेमाल करते थे। पिछले वर्ष यूरोपीय संघ ने शीशम समेत अन्य कई लकड़ियों को ईयूडीआर(यूरोपीय संघ वनाच्छादन विनियमन) में शामिल किया है। इसके तहत लकड़ी के उत्पादों के लिए निर्यातकों को अभिरक्षा श्रृंखला देनी होगी, जिसमें लकड़ी के स्रोत से लेकर अंतिम उत्पाद का रिकॉर्ड होगा। सबसे अधिक परेशानी निर्यातकों को होगी। इन्हीं परेशानियों को देखते हुए उद्यमियों और कारीगरों ने नए विकल्पों की तलाश की, जिसमें बबूल की लकड़ी को चुना गया है। यह लकड़ी सख्त होती है, जिसकी वजह से इस पर नक्काशी नहीं हो पाती। बदलती तकनीक ने नए रास्ते भी खोले हैं। अब कई उद्यमी बबूल की लकड़ी से फोटो फ्रेम से लेकर किचन टूल्स तक बना रहे हैं। इनकी मांग न सिर्फ घरेलू है, बल्कि विदेशी बाजार में भी है। इसके अलावा यूकेलिप्टिस, प्लाईवुड आदि का इस्तेमाल नक्काशीदार फर्नीचर के लिए हो रहा है।
फोटो फ्रेम, ट्रे, बाउल, थाली व चम्मच भी
बबूल की लकड़ी से फोटो फ्रेम, मिरर फ्रेम तो बन ही रहे हैं। इसके अलावा किचन में इस्तेमाल होने वाले उत्पाद मसलन थाली, चम्मच, बाउल, बाट समेत अन्य उत्पाद ग्राहकों को खूब लुभा रहे हैं। वॉल पैनल में भी बबूल की लकड़ी का ही अधिक इस्तेमाल हो रहा है। इनकी कीमत भी बेहद कम है, जो 150 रुपये से शुरू होकर उत्पाद के मुताबिक लाखों रुपये तक जाती है।
बोले उद्यमी
- उद्यमी और निर्यातक मयंक अग्रवाल बताते हैं कि बदलते समय के साथ यदि हमें अपनी जिले की नक्काशी और वुडन हैंडीक्राफ्ट कला को जीवित रखना है तो समय के साथ कदमताल करनी होगी। बबूल की लकड़ी से किचन उत्पाद बन रहे हैं। इनकी मांग घरेलू और विदेशों में भी है।
- कारोबारी आरिफ खान बताते हैं कि पहले शीशम, आम, सागौन समेत अन्य लकड़ियों का इस्तेमाल उत्पाद बनाने में होता था। अब इसमें बदलाव आया है। बबूल की लकड़ी सख्त होती है, लेकिन उसमें कीड़ा नहीं लगता। साथ ही वह वर्षों चलती है। अन्य पेड़ों की लकड़ी का भी इस्तेमाल हो रहा है।