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विधि पूर्वक किए श्राद्ध से होती पितरों की तृप्ति।

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सहारनपुर। विधि पूर्वक किए श्राद्ध से पितरों की तृप्ति होती है। श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को यश और कीर्ति प्राप्त होती है, लेकिन अगर सावधानी न बरती गई तो कष्ट भी भोगना पड़ता है। 25 सितंबर से शुरू हो रहे श्राद्ध करने का उत्तम समय सुबह 11 से दोपहर साढ़े बारह बजे तक है।
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ब्रहमपुरी कॉलोनी स्थित सिद्धपीठ शिव बगलामुखी मंदिर के अधिष्ठाता रोहित वशिष्ठ बताते हैं कि देश काल में पात्र में विधि पूर्वक श्रद्धा से पितरों के लिए जो कार्य किया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। देश का अर्थ स्थान है, काल का अर्थ समय है, पात्र का अर्थ वह ब्राह्मण है, जिसे हम श्राद्ध की सामग्री दे रहे हैं। इन तीनों को भली-भांति समझकर ही श्राद्ध करना चाहिए। धर्म शास्त्रों के अनुसार विधि पूर्वक किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्ति देता है। श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को आयु, पुत्र, धन-धान्य और यश प्रदान करता होता है। श्राद्ध में कमी रहने पर श्राद्धकर्ता का कल्याण नहीं होता बल्कि उसे कष्ट भोगना पड़ता है । श्राद्ध करने का उत्तम समय सुबह 11 से साढ़े बारह बजे तक है। क्योंकि, उस समय को शास्त्रों में कुतप योग कहा गया हैं। मगर समय के अभाव में प्रात काल भी श्राद्ध कर सकते हैं लेकिन दोपहर के बाद श्राद्ध नहीं करना चाहिए। श्राद्ध में ब्राह्मण के भोजन से पहले ग्रास अवश्य निकालना चाहिए।
इन बातों का रखे ध्यान
-- भोजन पत्ते पर रखकर गाय और कुत्ते को खिलाएं।
-- भोजन भूमि या छत पर डालकर कौआ को खिलाना चाहिए।
-- पत्ते पर रखकर देवताओं के लिए अन्न निकाले और गाय को खिलाएं।
-- चींटी आदि के लिए भी भोजन निकाले।
-- अग्नि के लिए भोजन निकालकर थोड़ा अन्न अग्नि में डालकर शेष अन्न गाय को खिलाएं।
-- इन सबके बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं।
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अति प्रिय है पितरों को श्रद्धा
सहारनपुर। श्रद्धा पूर्वक किया कर्म ही पूर्ण फल प्रदान करता है। अश्रद्धा से किया कर्म निष्फल हो जाता है। इसलिए श्राद्ध करते समय अपने पितरों के प्रति और भोजन करने वाले ब्राह्मण के प्रति श्रद्धा भाव रखे। पितरों की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए दोहते को भोजन अवश्य कराएं।
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ऐसे करें श्राद्घ
सहारनपुर। तिल और कुशा हाथ में लेकर लेकर संकल्प लें। चांदी का दान, भगवान के नाम का जप करें। दूध, गंगाजल, शहद, फल, दही, धान, तिल गेहूं, मूंग और सरसों का तेल शुभ माने गए हैं। तुलसी पत्र का प्रयोग भी श्राद्ध में अवश्य करना चाहिए। तुलसी की गंध से पितृगण प्रसन्न होते हैं। फलों में आम, बेल, अनार, आंवला, नारियल, खजूर, अंगूर और केले का इस्तेमाल करें। श्राद्ध में चंदन की सुगंध को भी शुभ माना गया है।
श्राद्ध में ब्राह्मण की महिमा
सहारनपुर। शास्त्रों में कहा गया है कि श्राद्ध में हर किसी को भोजन कराने का विधान नहीं है। पवित्र, बुद्धिमान, सदाचारी, संध्या वंदन करने वाला ब्राह्मण भोजन कराने योग्य है, जो ब्राह्मण गायत्री मंत्र का जप करता है वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
ऐसे भोजन का श्राद्घ में निषेध
सहारनपुर। जिस भोजन में बाल गिर गया हो, जिस अन्न में कीड़े पड़ गए हों, जिस भोजन पर कुत्ते की दृष्टि पड़ गई हो। बासी, दुर्गंध युक्त भोजन पर पहने हुए वस्त्र की हवा लग जाए वह श्राद्ध में वर्जित है। इसके अलावा राजमा, साबुत उड़द, मसूर, अरहर, गाजर, लौकी, बैंगन, शलगम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, काला जीरा, सिंघाड़ा, जामुन सुपारी भी श्राद्ध में निषेध है।

सात्विक भोजन और फलों से होती तृप्ति
सहारनपुर। ब्राह्मण को बैठाने के लिए रेशमी कंबल और कुशा का आसन श्रेष्ठ है। भोजन कराते समय श्राद्धकर्ता और ब्राह्मण मौन रहना चाहिए। भोजन मांगने के लिए हाथ से संकेत करें। ब्राह्मण के चरण बैठाकर धुलाने चाहिए। भोजन कराते समय निंदा और प्रशंसा न करें। ब्राह्मण से यह भी न पूछे भोजन कैसा बना है।
लोहे के बर्तन में न परोसे भोजन
सहारनपुर। श्राद्ध में सोना, चांदी, कांसा, तांबा धातु के बर्तनों अधिक महत्व है। लोहे के पात्र में भोजन नहीं परोसना चाहिए। मिट्टी के बर्तन में भोजन खिलाना भी उत्तम है।
श्राद्ध में क्या न करें
सहारनपुर। श्राद्ध करते समय पान, तंबाकू न खाएं, शरीर पर तेल भी न लगाएं, उपवास रखना और दवाई खाना भी श्राद्धकर्ता के लिए निषेध है । श्राद्ध में दो बार भोजन नहीं करना चाहिए। अधिक यात्रा नहीं करनी चाहिए। श्राद्ध वाले दिन दान लेने से बचना चाहिए।
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