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बीमार-ए-मुहब्बत कभी अच्छा भी तो होता 17-57-19

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सहारनपुर। सूरज की हुकूमत में उजाला भी तो होता जब धूप थी दीवार थी साया भी तो होता, ये क्या कि हमेशा रहा बीमार का बीमार, बीमार-ए-मुहब्बत कभी अच्छा भी तो होता। शायर डॉ. नवाज देवबंदी ने ऐसे ही एक से बढ़कर एक कलाम पेश कर श्रोताओं को दे रात तक कार्यक्रम से जोड़े रखा। मौका था जनता रोड स्थित एमएस कॉलेज मैदान पर आयोजित सहारनपुर महोत्सव के तहत हुए ऑल इंडिया मुशायरे का। इसमें देश भर से आए शायरों ने अपनी रचनाएं पढ़कर वाहवाही लूटी।
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डॉ. नवाज देवबंदी ने हमारे क़त्ल पे सच्चाई ने दुहाई दी, तेरे खिलाफ़ तेरे भाई ने गवाही दी से आग़ाज किया। इसके बाद उन्होंने ज्यादा वजन पर अपने कभी मग़रूर मत होना, तिनका तैरता रहता है पत्थर डूब जाता है और झीलों और तालाबों के जो क़ातिल होते हैं, उन शहरों से जालिम बारिश बदला लेती है जैसे अशयार सुनाकर भी अलग छाप छोड़ी। अश्क ने लोग समझे न थे सब निशाने उसी की जान पे थे, किस बुलंदी पर उसका सिर होगा पांव जिसके आसमां पे थे सुनाकर वाहवाही लूटी। अलीम वाजिद ने दिल परीशां है तुझको मनाने के लिए, मैं हूं बेचैन मेरी जां तुझे पाने के लिए सुनाया। अमजद अजीम ने चुटीले अंदाज में मेरी ही ससुराल ने हुलिया संवारा देर तक, सर से पांव तक मेरा सदका उतारा देर तक, मैंने जब उनको बताया कि मैं भी शायर हो गया, इतना सुनते ही मेरे सालों ने मारा देर तक’ सुनाकर खूब गुदगुदाया।
नैनीताल से आए मोहन मुंतजिर ने मैं दिल के टुकड़ों को पहाड़ कर लूंगा तुझे न दूंगा दोबारा कबाड़ कर लूंगा, तू अपनी सोच मेरे बाद तेरा क्या होगा, मैं अपना कोई न कोई जुगाड़ कर लूंगा सुनाकर तालियां बटोरी। हरदोई से आए सलमान जफ़र ने उलझे सुलझे हुए धागे भी चले आएंगे, भूले बिसरे हुए रिश्ते भी चले आएंगे, नेकनीयती से किसी काम का आगाज करो, फिर मदद करने फरिश्ते भी चले आएंगे। सुनाया। बाराबंकी से आए अली बाराबंकवी ने दर्द का चांद ढलता रहा रात भर, सिसकियां कोई भरता रहा रात भर, अश्क-ए-ग़म उसकी आंखों से बहते रहे, एक पत्थर पिघलता रहा रात भर सुनाया।
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बिलाल सहारनपुरी ने कल जो एक शाह था आज नहीं है साहेब, जिंदगी भर के लिए ताज नहीं है साहेब, चौदह सौ साल से हज को जाता है मुसलमान, तेरी सब्सिडी का मोेहताज नहीं है साहेब सुनाकर शाबाशी ली। डॉ. नदीम शाकिर ने तेरी तलब में तेरी आरजू में काट दिए, न जाने कितने ही दिन एक वजू में काट दिए, वो जिन दिनों में खुदा को तलाश करना था, वो दिन तो हमने तेरी जुस्तजू में काट दिए पढ़ा। फख़री मेरठी मुनाफे की तमन्ना थी मगर घाटा खरीदा है, लहू को बेचकर मजदूर ने आटा ख़रीदा है। सुनाकर आम आदमी का दर्द बयां किया। सबा बलरामपुरी ये क्या हुआ कि शहर का मंजर बदल गया, जितने भी थे चराग़ वो बेनूर हो गए, दिन रात हम किसी के तसव्वुर में खोए हैं, दुनिया समझ रही है मग़रूर हो गए सुनाकर वाहवाही लूटी। ख़ुर्शीद हैदर मुजफ्फरनगरी ने कभी जो उनसे मुलाक़ात हो गई होती, तो आंखों आंखों में हर बात हो गई होती, मैं बादलों पर तेरा नाम लिख देता तो मेरे गांव में बरसात हो गई होती सुनाया। हाशिम फिरोजाबादी ने जो मेरे देश के हैं गद्दार नहीं है जिनको इससे प्यार, वो हिंदुस्तान छोड़ दें सुनाकर तालियां बटोरी। मालेगांव से आए अल्ताफ़ जिया ने हर तरफ़ एक नूर था उसे हवाले थे बहुत, अब से कुछ पहले, चिराग़ों में उजाले थे बहुत सुनाया। अन्य शायरों ने भी अपने कलाम पेश किया। मुशायरे का संयोजन जावेद खान सरोहा के द्वारा किया गया। मुशायरे के दौरान सीडीओ संजीव रंजन, एसडीएम डीपी सिंह, सरदार अनवर, डॉ. शाहिद जुबैरी, शीतल टंडन, शमीम तहजीबी, साबिर अली खान, शमीम फारुक़ी, अवनीत कौर, सत्या शर्मा, अल्पना तलवार, पवन शर्मा, विक्रांत जैन, विजेंद्र त्रिपाठी आदि मौजूद रहे।
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