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मत पेड़ देख खजूरों के इन्होंने कब छांव दिए...

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देवबंद (सहारनपुर)। साहित्यिक संस्था संचेतना की काव्य गोष्ठी में कवियों ने वर्तमान परिस्थितियों, अंधविश्वास, ढोंग और पाखंड पर सुंदर रचनाएं प्रस्तुत कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
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सोमवार को शिक्षक नगर स्थित पूरणचंद शास्त्री के आवास पर हुई काव्य गोष्ठी का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से हुआ। इसके बाद ठा. श्याम सिंह पुंडीर ने पढ़ा.. इज्जतदार का सिर कभी नीचे नहीं झुकता, जिल्लत और किल्लत का कीचड़ नहीं उछलता। रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार, लूट, खसोट पर अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए लोकेश वत्स ने कहा..मत पेड़ देख खजूरों के इन्होंने कब छांव दिए, भ्रष्टाचार ने देखो हमको सिखला सारे दांव दिए। डा. सुधीर ने पढ़ा..युवा पीढ़ी नहीं भूली है जलिया वाले बाग की माटी, युवा पीढ़ी नहीं भूली है कारगिल युद्ध की घाटी। मीरा चौरसिया ने पढ़ा..ऊंचा है तिरंगा ऊंचा ही रहेगा, अमर शहीदों की कुर्बानी को हमेशा कहेगा। युवा कवि मोहित लांबा ने पढ़ा..दुख-सुख उतार-चढ़ाव, हंसना-रोना दुखते घाव, कई बार जिया है हमने, तुम चाहे मुझे कुछ भी कह लो मेरे मित्र, बाती में खुद जलकर उजाला किया है हमने। अशोक शर्मा ने कहा..साथ कुछ सूखे हुए पत्ते उड़ाकर ले गए, वो मेरे ख्वाबों को पलकों से उड़ाकर ले गए। विरेश त्यागी ने पढ़ा..मैं रखूंगा मान तुम्हारे सारे शुभ आशीषों का, हां मैं फिर श्रृंगार करुंगा जीवन के नव गीतों का। डा. पूरण चंद शास्त्री ने कहा..मलिन वेश बिखराए केश उतरे आभूषण, तो समझ लेना वही है मेरा जीवन स्रोत्र। अध्यक्षता पूरण चंद व संचालन डा. सुधीर ने किया। इस मौके पर मामचंद इंदू, ठा. रणवीर सिंह, ब्रजेश पुंडीर, देवी राम शर्मा, डा. डीके भारद्वाज, उन्मेष कांत आदि मौजूद रहे।
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