विवाह पंजीकरण जबरदस्ती लागू करना धार्मिक आजादी के खिलाफ : दारुल उलूम
देवबंद(सहारनपुर)। उत्तर प्रदेश सरकार के विवाह पंजीकरण अनिवार्य किए जाने के फैसले पर दारुल उलूम और अन्य देवबंदी उलमा ने कहा कि हम शादी के पंजीकरण के खिलाफ नहीं है, लेकिन ऐसा न करने वालों को सरकारी सुविधाओं से वंचित रखने का फरमान उत्पीड़नात्मक है।
योगी सरकार के फैसले पर इस्लामी तालीम के सबसे बड़े मरकज दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी बनारसी ने कहा कि शादी के पंजीकरण को जोर जबरदस्ती से लागू करना मजहबी आजादी के खिलाफ है। धार्मिक तौर पर शादी सिर्फ निकाह करने से हो जाती है। यह कहना कि अगर रजिस्ट्रेशन नहीं कराया जाएगा तो कानूनी हुकूक से वंचित कर दिया जाएगा ये सीधे सीधे उत्पीड़न करने वाला निर्णय है। मौलाना बनारसी ने कहा कि हम शादी रजिस्ट्रेशन के खिलाफ नहीं है, लेकिन सरकार को इसकी ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि अगर कोई अपनी मर्जी से रजिस्ट्रेशन कराता है तो आसानी के साथ उसका रजिस्ट्रेशन हो सके। दारुल उलूम जकरिया के वरिष्ठ उस्ताद एवं फतवा ऑनलाइन के प्रभारी मौलाना मुफ्ती अरशद फारुकी ने कहा कि योगी सरकार का यह फैसला जबरदस्ती थोपने वाला है। अगर इस फैसले को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की हैसियत से देखते हैं तो दो गवाहों के सामने निकाह हो जाता है जिसमें किसी भी सबूत की जरूरत नहीं पड़ती। बोर्ड की राय है कि रजिस्ट्रेशन होना चाहिए, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं करना चाहिए। मुफ्ती अरशद ने कहा कि अगर यूपी के हर बाशिंदे पर पहचान पत्र और आधार कार्ड है तो फिर रजिस्ट्रेशन कराने का फैसला सही है। उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके पास आज भी न तो पहचान पत्र है और न ही आधार कार्ड।