सहारनपुर। कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव में इस बार महा गठबंधन पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जाट और मुस्लिम के बरसों पुराने फार्मूले को साधने की कवायद में है, क्योंकि दोनों समुदाय के मतदाता ही इस सीट पर निर्णायक भूमिका में है। सपा से जुड़ी पूर्व सांसद तबस्सुम को रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ाने के पीछे मंशा दोनों समुदाय के बीच की खाई पाटना भी है, क्योंकि मुजफ्फरनगर दंगे के बाद यह समीकरण पूरी तरह बिखर गया था।
कैराना लोकसभा सीट पर उपचुनाव में समीकरण काफी उलझे हुए हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि पूरा विपक्ष एकजुट है। इतिहास गवाह है कि यहां जाट और मुस्लिम मतदाताओं ने अपने मनपसंद प्रत्याशी के सिर पर जीत का सेहरा बांधा है। 1952 से लेकर जितने भी चुनाव हुए, उनमें दोनों समुदाय के मतदाताओं ने एक तरफा मतदान किया है। यही वजह रही कि कि सियासी दलों ने दोनों समुदायों की कभी अनदेखी करने की हिमाकत नहीं की।
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जाट और मुस्लिम गठजोड़ वेस्ट यूपी में कारगर रहा है। 1989 और 1991 में भाजपा ने जाट मतदाताओं की बदौलत कैराना से जीत हासिल की थी। 1999 में अमीर आलम और 2004 में अनुराधा चौधरी की जीत का कारण भी जाट और मुस्लिम गठजोड़ ही रहा था। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद जाट और मुस्लिमों के बीच तलवारें खींच गई थी। छोटे चौधरी अजित सिंह ने 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में दोनों समुदाय को एक साथ लाने का भरसक प्रयास किया था, मगर वह कामयाब नहीं हो सके थे।
कैराना उप चुनाव को लेकर रालोद नेता जयंत चौधरी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती को यह समझाने में कामयाब रहे है कि जाट और मुस्लिम समीकरण बन जाए तो जीत की राह आसान हो जाएगी। यही वजह है कि पार्टी लाइन से हटकर सपा ने पूर्व सांसद तबस्सुम को रालोद के सिंबल पर चुनाव लड़ाने पर हामी भर दी। अब यह देखना दिलचस्प रहेगा कि महा गठबंधन जाट और मुस्लिम मतदाताओं को किस हद अपने समर्थन में खड़ा कर पाता है।