इलाज को भटकते हैं जिले के थैलेसीमिया पीड़ित
सहारनपुर। सहारनपुर, मंडल मुख्यालय होने के बावजूद यहां थैलेसीमिया रोग का इलाज नहीं है। ऐसे में इस बीमारी से जूझ रहे बच्चों को इलाज के लिए दिल्ली या पंजाब ले जाना पड़ता है।
रविवार को हकीकत नगर में लगे दिव्यांग प्रमाण पत्र वितरण कैंप में पहुंचे थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के अभिभावकों ने अपना दर्द बया किया। ढाई वर्षीय अबुबकर को पिता मुस्तकीम कैंप में लेकर पहुंचे थे। मुस्तकीम ने बताया कि वह बेटे का इलाज दिल्ली एम्स में करा रहे हैं, क्योंकि सहारनपुर में इस बीमारी का इलाज नहीं है। यहां केवल खून चढ़ाया जा सकता है। बाकी दवाओं और अन्य इलाज के लिए दिल्ली ही जाना पड़ता है। चार वर्षीय कृष्णा की मां पायल ने बताया कि उनके बच्चे का इलाज पीजीआई चंडीगढ़ में चल रहा है। यदि सहारनपुर में इसका पूरा इलाज मिले तो उन्हें भटकना न पड़े। ढाई वर्षीय प्रशांत की मां पूजा ने भी सहारनपुर में पर्याप्त इलाज न होने की बात कही। आपको बता दें कि प्रदेश के कुल 15 मेडिकल कॉलेजों में से नौ मेडिकल कॉलेजों में ही थैलेसीमिया रोग के इलाज की सुविधा उपलब्ध है। जिन कॉलेजों में थैलासीमिया का इलाज दिया जा रहा है उनमें एलएलआरएम मेरठ, एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा, सैफई मेडिकल कॉलेज इटावा सैफई, जीएसवीएम कानपुर, केएसएमयू लखनऊ और एसएन चिल्ड्रेन मेडिकल कॉलेज इलाहाबाद शामिल हैं। जबकि, पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में थैलेसीमिया का इलाज पूरी तरह फ्री है। चंडीगढ़ पीजीआई में कुछ खर्चों को छोड़कर शेष इलाज फ्री है। एम्स दिल्ली में भी सुविधाओं की कमी नहीं है। मगर उत्तर प्रदेश में थैलासीमिया पीड़ितों के इलाज की सेवाएं लचर हैं।
जिला अस्पताल में बदले में मांगा जाता है खून
कैंप में पहुंचे थैलेसीमिया से पीड़ित अनेक बच्चों के अभिभावकों ने बताया कि उनके बच्चों को एसबीडी जिला अस्पताल में खून चढ़ाया जाता है। आरोप है कि जिला अस्पताल के कर्मचारी बदले में खून की मांग करते हैं। खून न देने पर आनाकानी की जाती है। उनकी मांग है कि अन्य राज्यों की तरह यहां भी थैलेसीमिया से पीड़ितों को मुफ्त खून मिले।
प्रदेश में भी थैलेसीमिया का इलाज मुफ्त है। अनेक मेडिकल कॉलेज में थैलेसीमिया के इलाज की सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा कोई भी सरकारी अस्पताल थैलेसीमिया के पीड़ित को रक्त देने से मना नहीं कर सकता। कोई सरकारी अस्पताल थैलेसीमिया से पीड़ित के परिजन से रक्त की भी मांग नहीं कर सकता।
- डॉ. नवरत्न गुप्ता, नोडल अधिकारी/चिकित्सक एलएलआरएम मेरठ।