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मुजफ्फरनगर दंगा भारतीय इतिहास में बदनुमा दाग: असरारुलहक

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देवबंद (सहारनपुर)। प्रदेश की योगी सरकार द्वारा वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के आरोपियों को बचाए जाने के प्रयासों पर कांग्रेस सांसद व दारुल उलूम की मजलिस-ए-शूरा के सदस्य मौलाना असरारुल हक कासमी ने कहा कि यह सरासर अन्याय और हजारों मजलूमों के जख्मों पर नमक छिड़कने के बराबर है।
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शुक्रवार को जारी बयान में मौलाना असरारुलहक कासमी ने कहा कि मुजफ्फरनगर दंगों में जिस तरह खुलेआम भाजपा नेताओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और लोगों को भड़का कर एक विशेष समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया वह भारतीय इतिहास में बदनुमा दाग है। जिसके दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेकिन अफसोस की बात है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगामी लोकसभा चुनाव में लाभ उठाने और जाट समुदाय को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इस तरह की चाल चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार की कार्रवाई से मुजफ्फरनगर दंगों में प्रभावित होने वाले हजारों लोगों के साथ यह दोहरा जुल्म होगा। मौलाना असरारुलहक ने राज्य व केंद्र सरकार से इस मामले में निष्पक्ष और भेदभाव से ऊपर उठकर कार्रवाई करने की मांग की है।
मदरसा इमाम मोहम्मद अनवर शाह में छात्रों को पुरस्कारों का वितरण
देवबंद। मदरसा जामिया इमाम मोहम्मद अनवर शाह में आयोजित वार्षिक इनामी व दस्तारबंदी कार्यक्रम में छात्रों को लाखों रुपये के पुरस्कारों का वितरण किया गया।
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ईदगाह रोड स्थित मदरसे में हुए कार्यक्रम में संस्था के मोहतमिम मौलाना अहमद खिजर शाह मसूदी ने छात्रों को दो लाख रुपये कीमत की पुस्तकें और नगद धनराशि दी गई। इस दौरान छात्रों की दस्तारबंदी करते हुए उन्होंने कहा कि जिन छात्रों को अपना तालीमी सफर बेहतर अंदाज में जारी रखाना चाहिए। क्योंकि तालीम ही इंसान को तरक्की के रास्ते पर ले जाती है। उन्होंने कहा कि शिक्षा से ही इंसान डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और मुफ्ती बन सकता है। इस मौके पर मौलाना शीश अहमद, मौलाना निसार खालिद, मुफ्ती नवेद, मुफ्ती उस्मान, मौलाना तल्हा आजमी, मौलाना बदरुल इस्लाम, मौलाना ऐजाज, मौलवी साकिब, मौलाना नदीमुलवाजदी आदि मौजूद रहे।

संविधान में निहित अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन: मदनी
देवबंद। जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अल्पसंख्यक दर्जे को समाप्त किए जाने के मामले में सरकार के हलफनामे का विरोध करते हुए कहा कि यह संविधान में निहित अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।
शुक्रवार को बयान जारी कर मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि ऐतिहासिक तौर पर और उसके चरित्र से यह एक अल्पसंख्यक संस्था है। केवल सरकार से वित्तीय अनुदान प्राप्त करने भर से इसकी अल्पसंख्यक स्थिति नहीं बदल सकती है। उन्होंने कहा कि शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन ने अलीगढ़ में इस संस्था की नींव अपने हाथों से डाली थी और शुरुआत के दौरान डा. जाकिर हुसैन और जामिया के शिक्षकों ने इस संस्था को मजबूत करने के लिए कड़ी मेहनत की थी। यह एकमात्र कारण है कि यह संस्था अपने अल्पसंख्यक चरित्र को बनाए रखने में सफल है। मौलाना मदनी ने कहा कि वर्ष 2011 में भारत सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग के निर्णय को स्वीकार करते हुए इस संस्था को एक अल्पसंख्यक दर्जा स्वीकार किया था। इस प्रकार आगे आने वाली सरकारों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है की वह इसके अल्पसंख्यक दर्जे की रक्षा करें।
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