सहारनपुर। भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण और पूर्व विधायक इमरान मसूद के बीच शुक्रवार को प्रेम का प्याला जिस तरह छलका है, उससे जिले की सियासत में नए समीकरणों को लेकर सुगबुगाहट जरूर शुरू हो गई है। अराजनैतिक रहते राजनीति में दखल की तैयारी में लगी भीम आर्मी के सामने अभी खुद की राजनीतिक पकड़ को साबित करने की चुनौती है। भीम आर्मी के समर्थक अब तक बसपा का वोट बैंक रहे हैं। भीम आर्मी प्रमुख को कहीं ना कहीं इस बात का अहसास जरूर है।
योगी सरकार द्वारा बृहस्पतिवार देर रात भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण को रासुका में 48 दिन पहले रिहा किए जाने के फैसले पर सियासी घमासान मच गया था। सियासत में इसके कई मतलब निकाले जाने लगे थे। रावण ने रिहाई के बाद जिस तरह भाजपा को निशाने पर लिया, उससे तमाम कयासों पर पानी फिर गया। रावण ने मीडिया से बात करते हुए भाजपा के खिलाफ बनने वाले गठबंधन के समर्थन का ऐलान किया। दोपहर में कांग्रेस उपाध्यक्ष और पूर्व विधायक इमरान मसूद से मिलने के बाद रावण ने जिस तरह के संकेत दिए, उससे मुस्लिम और दलितों के नए समीकरणों को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई। इसमें कोई दोराय नहीं है कि वेस्ट यूपी में इमरान मसूद मुस्लिमों का बड़ा चेहरा हैं। सहारनपुर की राजनीति में उनका दखल किसी से छिपा नहीं है, मगर भीम आर्मी के सामने अभी खुद की जमीन बनाने की चुनौती जरूर है। कैराना उप चुनाव में गठबंधन के साथ खड़े होकर भीम आर्मी ने भाजपा की मुश्किल बढ़ा दी थी। वैसे भी सहारनपुर बसपा का सबसे गढ़ माना जाता रहा है। इमरान पहले भी रावण को चुनाव लड़ने का ऑफर दे चुके हैं। शुक्रवार को भी इमरान ने रावण को संसदीय चुनाव लड़ने की पेशकश की, लेकिन रावण ने उसे स्वीकार करने से गुरेज किया। ऑफर स्वीकार न करने के पीछे क्या वजह है, यह कहना तो मुश्किल है, मगर अराजनैतिक रहते राजनीति में दम दिखाने की भीम आर्मी की राह आसान नहीं है।