ईद पर गरीबों की खुशियों का रखें पूरा ख्याल
सहारनपुर। जमीयत दावतुल मुसलीमीन के संरक्षक और इमाम कारी इसहाक गोरा ने हेल्पलाइन के जरिए बताया कि सदका-ए-फितर वो रकम होती है, जो आर्थिक रूप से मजबूत व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को देता है। ईद की नमाज से पहले इसे अदा करना चाहिए। फितरे की रकम गरीबों, बेवाओं, यतीमों और जरूरतमंद लोगों को दी जाती है। इस सबके पीछे सोच यही है कि ईद के दिन कोई भी खाली हाथ न रहे। क्योंकि यह खुशी का दिन है। अल्लाह ताला ने ईद का त्योहार गरीब और अमीर सभी के लिए बनाया है। गरीबों लोगों की खुशी में कमी न आए। इसलिए अल्लाह ने हर संपन्न मुसलमान पर जकात और फितरा देना फर्ज कर दिया है। पत्नी को अपना सदका-ए-फितर खुद अदा करना चाहिए।
सवाल:- मेहंदी सराय निवासी अदनान ने पूछा कि वह रोजे से हैं। उनके दांत में तकलीफ है। डाक्टर ने बताया है कि दांत निकालना पड़ेगा, लेकिन वह रोजा कजा नहीं करना चाहते हैं। ऐसी सूरत में वह क्या करें।
जवाब:- शरीयत के मुताबिक यदि खून या दवा हलक के अंदर न जाए तो रोजे की हालत में दांत निकलवाया जा सकता है।
सवाल:- वर्धमान कालोनी निवासी दाऊद ने मालूम किया कि उनकी पिछले वर्ष की कुछ जकात अदा करना बाकी रह गई है, जिसे वह अदा नहीं कर पाए। अब क्या पिछली और इस बार की जकात देना दोनों जरूरी है।
जवाब:- जी हां! यदि किसी व्यक्ति ने पिछले वर्ष की जकात अदा नहीं की और अगला वर्ष यानी रमजान आ गया तो यह गुनाह में शामिल होता है। इससे लोगों को बचना चाहिए। जकात अदा करना हर साहिबे निसाब पर बड़ी जिम्मेदारी है। मालदार को अपनी जकात जिम्मेदारी से अदा करनी चाहिए, जिस वर्ष की जकात हो उसी साल उसे अदा कर देना चाहिए। शरीयत के अनुसार पिछले और इस वर्ष की जकात एक साथ अदा करना जरूरी है।
सवाल:- बिहारीगढ़ निवासी शाइस्ता ने मालूम किया कि मुझे अपना सदका-ए फितर ख़ुद अदा करना चाहिए या मेरे पति उसको अदा करेंगे।
जवाब:- शरीयत के मुताबिक पत्नी को अपना सदका-ए-फितर खुद अदा करना चाहिए। यदि पति अपनी खुशी से पत्नी का सदका-ए-फितर अदा करे तो भी कोई दिक्कत नहीं है।