सफर में रोजा छोड़ने की इजाजत, मगर वापसी में कजा जरुरी
सहारनपुर। सफर की हालत में रोजा छोड़ने की इजाजत है। परंतु वापसी के बाद रोजे की कजा लाजमी है। रोजे के सिलसिले में ये शर्त भी है कि यह सफर इतने फासले का हो कि शरीयत उसको सफर मानती हो। तभी ये सुविधा हासिल होगी। हेल्पलाइन पर पूछे गए सवाल पर जमियत दावातुल मुसलीमीन के अध्यक्ष कारी इसहाक गोरा ने यह जवाब दिया।
रोजेदारों की हेल्पलाइन पर मुरादाबाद से अतीक सिद्दीकी ने पूछा कि शरीयत के मुताबिक रमजान में सफर करने पर रोजा रखने की इजाजत है या नहीं? और उसके उसूल क्या हैं? शरीयत के मुताबिक सफर कितने किमी पर मान्य होता है? सफर में नमाज तो आधी हो जाती है पर क्या रोजों का भी ये ही हुकुम है। कुरान और हदीस की रोशनी में बताएं।
जवाब में कारी इसहाक गोरा ने इस्लामिक पुस्तक का हवाला देते हुए बताया कि सफर की हालत में नमाज तो आधी हो जाती है। परंतु रोजा वापसी के बाद पूरा ही रखना पड़ता है। शरीयत में सफर की शर्त 48 मील है। 48 मील अंग्रेजी में 7. 25 किमी होता है। यदि कोई व्यक्ति रमजान के महीने में सफर कर रहा हो तो इन बातों का विशेष ध्यान रखे कि सफर कैसा भी हो हर हालत में मुसाफिर के लिए रोजा न रखने की गुंजाइश है। परंतु बेहतर ये भी है कि सफर आसान हो तो रोजा कजा न करें। कुरान ए पाक में कहा गया है कि यदि तुम रोजा रखो तो ये तुम्हारे लिए ज्यादा बेहतर है। ये व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह रोजा रख कर सफर कर सकता है या नहीं।
प्रश्न- यदि सहरी या इफ्तारी की सुविधा न हो तो रोजा कजा करने में कोई हर्ज नहीं है।
जवाब- माआरिफुल कुरान के अनुसार सफर के दौरान अगर किसी जगह पर 15 दिन से कम ठहरना है तो ये दिन सफर में शुमार होंगे। परंतु अगर नियत 15 दिन से ज्यादा की है तो वह व्यक्ति मुसाफिर नहीं रहा। बल्कि मुकीम बन गया। इसलिए उसको रोजे रखना जरूरी है। परंतु यदि कोई व्यक्ति लगातार सफर में है, कुछ दिन ठहरता है आगे बढ़ जाता है और किसी जगह 15 दिन लगातार नहीं ठहरता है तो ऐसा व्यक्ति मुसाफिर समझा जाएगा। चाहे कितने ही दिन क्यों न गुजर जाएं।