सहारनपुर। आरक्षण दलितों के अधिकारों के प्रोटेक्शन की व्यवस्था है। यदि आरक्षण न होता तो दलित काबिल होने के बावजूद आगे नहीं बढ़ पाते। यह बात दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने अमर उजाला के साथ विशेष बातचीत में कही। चंद्रभान प्रसाद शुक्रवार को एक सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि हिस्सा लेने सहारनपुर पहुंचे थे।
चंद्रभान प्रसाद का मानना है कि सवर्ण समाज में अच्छे लोग पहले भी थे और आज भी हैं, मगर कुछ लोगों की मानसिकता आज तक नहीं बदली है। ऐसे लोग दलित को बराबर में बिठाना स्वीकार कर सकते हैं, मगर एक दलित उनका बॉस बनकर रहे यह उन्हें स्वीकार्य नहीं है। यही वजह है कि संविधान लागू होने के करीब 69 वर्ष बाद भी आईआईटी और तमाम यूनिवर्सिटीज व अन्य सरकारी विभागों में दलितों के बड़े पद खाली हैं। इस सबके पीछे एक सोची समझी साजिश है। देश के वर्तमान हालात पर उन्होंने कहा कि 2014 के बाद देश के एक तबके को लगने लगा था कि उनकी शासन में वापसी हो गई है। अब वह जो कहेंगे और करेंगे वही कानून होगा। अपनी इसी मानसिकता के साथ वह गैरकानूनी घटनाओं को अंजाम देने से पीछे नहीं हट रहे हैं। यहां तक की संविधान की प्रतियां जलाकर अपनी मानसिकता का परिचय दे रहे हैं। आजादी के बाद दलितों के हालात में क्या बदलाव आया? इस सवाल के जवाब में उनका कहना था कि दलितों में आर्थिक और सामाजिक क्रांति आई है। मगर समाज के उत्थान के लिए अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है। भीम आर्मी को उन्होंने समय की जरूरत बताया। उनका मानना है कि भीम आर्मी ने लोगों में आत्मविश्वास भरा है। अब दलित समाज उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने लगा है। जिसका संदेश उत्पीड़न करने वालों तक पहुंचा है।