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आरटीई को लागू कराना प्रशासन के लिए चुनौती बना

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आरटीई को लागू कराना प्रशासन के लिए चुनौती बना
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सहारनपुर। आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार। इस कानून के लागू होने के बाद गरीब परिवारों के बच्चों ने भी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाई का सपना देखा था। कानून बनने के नौ साल बाद भी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाई करने का गरीब बच्चों का सपना महज एक सपना ही बना हुआ है। वर्तमान में इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिले चल रहे हैं, जिसमें शिक्षा का अधिकार कानून के दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है। ऐसे में कानून को लागू कराना प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है।
जनपद में सीबीएसई के करीब 65 स्कूल संचालित हैं, जबकि दो स्कूल आईसीएसई से संबद्ध हैं। इन स्कूलों में प्री-नर्सरी से 12वीं तक के विद्यार्थियों की कुल संख्या 80 हजार से अधिक है। आरटीई के तहत इन 80 हजार विद्यार्थियों में कम से कम 20 हजार विद्यार्थियों का दाखिला होना चाहिए, जो गरीब परिवारों से ताल्लुक रखते हों। मगर शासन, प्रशासन और शिक्षा विभाग आज तक कानून को सही से पालन नहीं करा पाए हैं। पिछले वर्ष अभिभावकों ने आरटीई के तहत अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिला दिलाने के लिए आवेदन किया था। मगर बेसिक शिक्षा विभाग ने मात्र 900 बच्चों के नाम की सूची जारी की। इससे भी हैरान करने वाली बात यह है कि विभाग मुश्किल से 300 बच्चों को ही दाखिला दिला पाया। किसी स्कूल ने पांच और किसी ने दस बच्चों को दाखिला दिया, जबकि ज्यादातर स्कूलों ने कानून को मानने से साफ इनकार कर दिया। यानी जहां 20 हजार विद्यार्थियों को दाखिला मिलना चाहिए था, वहां महज 300 बच्चों को दाखिला मिलना कानून की सफलता नहीं कही जाएगी।
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ऑनलाइन कर सकते हैं आवेदन
शिक्षा का अधिकार कानून की विफलता की एक बड़ी वजह इसके प्रति लोगों में जानकारी का अभाव होना भी है। यही वजह है कि जितने आवेदन आने चाहिए उतनी संख्या में आवेदन नहीं आते हैं। वर्तमान में भी आवेदन की प्रक्रिया चल रही है, मगर जनपद के ज्यादातर अभिभावकों को पता नहीं है। कोई भी पात्र व्यक्ति अपने बच्चे को कानून के तहत दाखिला दिलाने के लिए आरटीई25 डॉट यूपीएसबीसी डॉट जीओवी डॉट इन पर आवेदन कर सकता है।
क्या है शिक्षा का अधिकार अधिनियम
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में लागू हुआ। इसके तहत छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य किया गया है। सरकारी स्कूलों में 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए पढ़ाई के साथ ही यूनिफॉर्म, किताबें, बैग आदि सब फ्री है। जबकि प्राइवेट स्कूलों में विद्यार्थियों की कुल संख्या के कम से कम 25 फीसदी बच्चे फ्री शिक्षा वाले होने जरूरी हैं, जिनका दाखिला शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत हुआ हो।

यह है दाखिले की प्रक्रिया
शिक्षा का अधिकार कानून के तहत गरीब बच्चों से आवेदन लेकर उनकी सूची तैयार कर स्कूलों में दाखिला दिलाने की जिम्मा बेसिक शिक्षा विभाग का है। विभाग आवेदन लेकर पात्र बच्चों की सूची तैयार कर उनको नजदीकी स्कूल आवंटित करता है। स्कूलों का दायित्व है कि वह बच्चे को दाखिला दें। सरकार ने बच्चों के लिए फीस निर्धारित की हुई है। स्कूलों को बच्चों को दाखिला देकर उनके फॉर्म तैयार कर विभाग को भेजने होते हैं। विभाग उनको शासन को फॉरवर्ड करता है, जिसके बाद शासन से स्कूल के खाते में पैसा पहुंचता है।
स्कूलों ने खड़े किए हाथ
शिक्षा का अधिकार अधिनियम को पूरी तरह लागू कराने के लिए चार दिन पहले डीएम पीके पांडेय ने विकास भवन में पब्लिक स्कूलों की बैठक बुलाई थी। बैठक में सीडीओ संजीव रंजन, बीएसए रमेंद्र कुमार सिंह और डीआईओएस आरके तिवारी मौजूद थे। मगर हैरत की बात कि कोई भी सीबीएसई या आईसीएसई स्कूल संचालक बैठक में नहीं पहुंचा। कुछ हिन्दी मीडियम निजी स्कूलों के संचालक जरूर पहुंचे थे। ऐसे में डीएम ने दोबारा बैठक बुलाने के निर्देश बीएसए को दिए हैं। उधर, स्कूलों का तर्क है कि वह शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत बच्चों को दाखिला देने को तैयार हैं, मगर शासन से फीस का पैसा नहीं मिलता है। इसलिए वह फ्री में बच्चों को पढ़ा नहीं सकते हैं।
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शिक्षा का अधिकार कानून को लागू कराने के लिए हम पूरी तरह गंभीर हैं। पिछले दिनों स्कूलों की बैठक बुलाई थी, मगर किन्हीं कारणों से स्कूल संचालक नहीं पहुंचे। दोबारा बैठक बुलाई है। प्रयास यही है कि गरीब बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिला मिल सके, जिससे उन्हें भी मुख्य धारा से जुड़ने का अवसर मिले। मगर यह स्कूल संचालकों के सहयोग के बिना संभव नहीं है।
पीके पांडेय, डीएम।
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