सहारनपुर। गंगोह ब्लॉक पर टीबी का मनहूस साया मंडरा रहा है। तेजी से फैल रहा टीबी का वायरस लोगों को अपना शिकार बना रहा है। अप्रैल 2017 के आंकड़े उठाएं तो टीबी के खतरनाक स्वरूप एमडीआर (मल्टी ड्रग रजिस्टेंट) के भी सर्वाधिक मरीज गंगोह में ही पाए गए हैं। सीएचसी पर प्रतिमाह 60 से 70 टीबी के मरीज पहुंचते हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि टीबी यूनिटों में गंगोह यूनिट मरीजों की संख्या के लिहाज से जनपद में पहले पायदान पर है। कुंडाकला समेत करीब 19 गांव ऐसे हैं, जहां टीबी घर कर गई है।
जनवरी 2017 से दिसंबर 2017 तक की बात करें तो गंगोह सीएचसी पर टीबी के 365 मामले दर्ज किए गए, जिनका उपचार सीएचसी पर ही चल रहा है। इससे भी हैरान करने वाली बात यह है कि इस वर्ष जनवरी से अभी तक 200 के करीब टीबी के नए मरीज सीएचसी पहुंचे हैं। गंगोह सीएचसी पर हर महीने पहुंचने वाले मरीजों में से 35 से 40 में एमडीआर पॉजिटिव पाया जा रहा है। इसकी वजह से यहां हर वर्ष दर्जन लोग टीबी से दम तोड़ रहे हैं। टीबी के लगातार हावी होने की वजह से ही स्वास्थ्य विभाग को जिला अस्पताल के बाद सीएचसी गंगोह पर डीएनए टेस्ट की लैब बनानी पड़ी है, जहां टीबी का टेस्ट होता है।
जानकर हैरानी होगी कि मलेरिया, डेंगू, डायफायड, चिकनगुनिया समेत जितनी भी मौसमी बीमारियां हैं वह जनपद में सबसे पहले गंगोह ब्लॉक के खादर क्षेत्र वाले गांवों पर अटैक करती हैं। स्वास्थ्य विभाग ने खादर के ऐसे 19 गांव चिह्नित किए हुए हैं। बीमारियां फैलने की प्रमुख वजह लोगों का रहन सहन का स्तर और जागरूकता का अभाव है। स्वास्थ्य विभाग कई साल से लोगों को जागरूक करने के लिए कैंप और अभियान चला रहा है।
गांव और एमडीआर पॉजिटिव मरीज
अप्रैल 2017 के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो एमडीआर केस वाले मामले कुंडाकला में एक परिवार के तीन सहित चार मरीज, धानवा में दो, बहलोलपुर में दो, खानपुर में दो, तीतरों में दो, गंगोह में दो, मनोहरा में दो, बुड्ढाखेड़ा में दो, खडलाना, डूभर किशनपुर, कलसी, बल्लामाजरा, मोहनपुरा, ततारपुर कलां, मानपुर थली, पापडी, लखनौती ढलावली और जेहरा में एक-एक मरीज में एमडीआर पॉजिटिव पाया गया था।
टीबी के लक्षण
दो सप्ताह से अधिक खांसी का बने रहना टीबी हो सकता है।
खांसी के साथ बलगम का आना और कभी कभी खून आना।
भूख कम लगना और वजन का तेजी से कम होना।
शाम या रात में बुखार आना और सर्दी के बावजूद पसीना आना।
सांस उखड़ना या सांस लेते हुए सीने में दर्द होना।
कई बार कोई भी लक्षण नहीं होता
टीबी के नुकसान
टीबी के बैक्टीरिया शरीर के जिस हिस्से में होता है उसके टिश्यू को नष्ट कर देता है।
फेफड़ों में टीबी हो तो फेफड़े धीरे-धीरे बेकार हो जाते हैं।
यूट्स की टीबी से बांझपन की समस्या पैदा होती है।
हड्डियों की टीबी हड्डियों को गला देती है।
ब्रेन की टीबी से दौरे आते हैं।
लीवर में टीबी हो तो पेट में पानी भर सकता है।
शरीर को कैसे नुकसान पहुंचाता है टीबी
टीबी बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। बुखार या खांसी के दौरान मरीज की आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता कम होते ही टीबी की बैक्टीरिया हावी हो जाता है। टीबी आमतौर पर फेफड़ों से शुरू होती है। मगर यह ब्रेन, यूट्रस, मुंह, लीवर, किडनी, गला, हड्डी में भी हो सकती है। मरीज के खांसने या छींकने के कारण मुंह और नाक से निकलने वाली बारीक बूंदों से यह इंफेक्शन फैलता है। यदि टीबी के मरीज के बेहद करीब बैठकर बात की जाए तो भी इंफेक्शन के फैलने का खतरा रहता है। गंगोह सीएचसी प्रभारी का कहना है कि फेफड़ों के अलावा बाकी टीबी एक से दूसरे व्यक्ति में नहीं जाती। यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली बीमारी होती है।
एक मरीज का खर्च साढ़े चार लाख रुपये
गंगोह सीएचसी प्रभारी डाक्टर अनवर अंसारी ने बताया कि टीबी के खतरनाक स्वरूप यानी एमडीआर पॉजिटिव होना सरकार, स्वास्थ्य विभाग और मरीज के लिए बड़ी चुनौती है। एक एमडीआर के मरीज पर सरकार का साढ़े चार लाख रुपया खर्च आता है। क्योंकि एमडीआर मरीज के लिए सामान्य दवाएं बेअसर हो जाती हैं। ऐसे में बीमारी को पकड़ने के लिए विशेष जांच और ठीक करने के लिए अलग से दवाओं की व्यवस्था की जाती है। इन मरीजों की यूनिट भी टीबी के सामान्य मरीजों से अलग बनाई जाती है।