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मरीज तक पहुंचते-पहुंचते दस गुना हो जाते है जेनेरिक दवाओं के दाम

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सहारनपुर। जेनेरिक दवाओं की बिक्री में बड़ा खेल चल रहा है। इन दवाओं पर ड्रग प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) लागू न होने के कारण कंपनियां मनमाने रेट पर दवाओं को बाजार में उतार रही हैं। इसका सीधा नुकसान मरीजों को हो रहा है और रिटेलर तथा निजी चिकित्सकों के मेडिकल स्टोर संचालकों को बड़ा फायदा मिल रहा है। सस्ता इलाज होने के बावजूद भी मरीजों को भारी रकम खर्च करनी पड़ती है। इसी वजह से गरीब मरीज तो अपना इलाज भी नहीं करा पाते हैं।
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किसी भी बीमारी के लिए चिकित्सक जो दवा लिखता है। ठीक उसी दवा के सॉल्ट वाली जेनेरिक दवाएं काफी कम कीमत पर मरीज को उपलब्ध हो सकती हैं। कीमत में अंतर दस गुना तक हो सकता है। बहुत कम लोगों को जानकारी है कि नामी दवा कंपनियां ब्रांडेड के साथ-साथ कम कीमत वाली जेनेरिक दवाएं भी बनाती हैं। मगर ज्यादा लाभ लेने के चक्कर में चिकित्सक और कंपनियां लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं उपलब्ध कराते। जागरूकता के अभाव में गरीब मरीज को भी केमिस्ट से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर होना पड़ता है। चिकित्सक अगर मरीज को दवाओं के साल्ट लिखें तो मरीज थोक विक्रेता से कम दाम में दवा खरीद सकता है।
क्या है जेनेरिक दवाएं
सहारनपुर। औषधि एवं प्रसाधन अधिनियम 1940 और रूल 45 के जानकार एडवोकेट दलजीत सिंह कोचर बताते हैं कि जेनेरिक दवाओं के लिए सिर्फ साल्ट लिखा जाता है। ताकि मरीज किसी भी मेडिकल स्टोर से उस साल्ट की दवा प्राप्त कर सकें। सामान्य तौर पर जैसे ओमिप्राजोल, नॉरफ्लॉक्स, पैरासिटामॉल, एमलोडिपिन, एटीनोल सहित सैकड़ों साल्ट जेनेरिक दवाओं में उपलब्ध हैं। मगर कंपनियां साल्ट के नाम से दवाओं का रैपर न बनाकर ब्रांड के नाम से बनाती हैं। उदाहरण के तौर पर पैरासिटामॉल सामान्य रूप से बुखार के लिए इस्तेमाल होती है। मगर बाजार में पैरासिटमॉल साल्ट की दवाओं को विभिन्न नामों से बेचा जाता है। इसलिए चिकित्सक जो दवा का नाम लिखता है, वह चिकित्सक के मेडिकल स्टोर के अलावा कहीं और नहीं मिलती है। अगर चिकित्सक सीधा साल्ट का नाम लिखें तो मरीज कहीं से भी सस्ते दाम में दवाई खरीद सकता है।
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इथीकल के बराबर ही कारगर हैं जेनेरिक दवाएं
सहारनपुर। थोक दवा कारोबारी बताते हैं कि जेनेरिक दवाइयों की गुणवत्ता ब्रांडेड दवाइयों से कम नहीं होती। जितना असर ब्रांडेड दवाएं करती हैं, उतना ही काम जेनेरिक दवाएं भी करती हैं। उनकी डोज, साइड- इफेक्ट, सामग्री ब्रांडेड दवाओं के बराबर ही होती है। उदाहरण के तौर पर ब्रांडेड दवा का दस गोली का पैकेट अगर 500 रुपये का है तो एक गोली की कीमत 50 रुपये बनती है। मगर इसी साल्ट की जेनेरिक दवाओं का पत्ता 100 रुपये में बाजार में मिल जाता है और थोक विक्रेता के यहां इसी पत्ते की कीमत 20 रुपये तक हो सकती है। इस हिसाब से एक गोली दो रुपये में मरीज को मिल सकती है। मगर जेनेरिक दवाओं पर ड्रग प्राइज कंट्रोल आर्डर (डीपीसीओ) लागू न होने के कारण कंपनियां और रिटेलर मनमाने दाम पर दवाओं को बेचते हैं। दिलचस्प बात यह है कि किडनी, यूरिन, बर्न, दिल संबंधी रोग, न्यूरोलोजी, डायबिटीज जैसी बीमारियों में तो ब्रांडेड व जेनेरिक दवा की कीमत में बहुत ही ज्यादा अंतर देखने को मिलता है। जानकार व्यक्ति अगर केमिस्ट से जेनेरिक दवा मांग भी ले तो विक्रेता उपलब्धता से इंकार कर देते हैं।

जन औषधि केंद्र पर नहीं उपलब्ध होती दवाएं
सहारनपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीब मरीजों के इलाज के लिए जेनेरिक दवाओं के लिए जन औषधि केंद्र खुलवाए थे। मगर सहारनपुर में चल रहे इन औषधि केंद्रों पर मरीजों को पूरी तरह दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। इस वजह से मजबूर होकर मरीज को अन्य मेडिकल स्टोरों और चिकित्सकों के यहां से ही दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।

अपनी जिम्मेदारी से बच रहे अधिकारी
सहारनपुर। जेनेरिक दवाओं के दामों में चल रहे खेल को लेकर अफसर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं। सीएमओ बीएस सोढ़ी से इस संबंध में बात की गई तो उन्होंने ड्रग विभाग पर मामले को टाल दिया। असिस्टेंट कमिश्नर ड्रग विभाग राजेश त्रिपाठी ने बताया कि इस तरह शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। जेनेरिक दवाओं को मनमाने प्रिंट पर नहीं बेचा जा सकता है। सिटी मजिस्ट्रेट राजेश कुमार का कहना है कि जेनेरिक दवाओं पर कई गुना दाम पर बेचे जाने की जानकारी मिली है। जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।
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