... मैं झीलों के सन्नाटों से बुना हिमालय का क्रंदन हूं
देवबंद (सहारनपुर)। मेघराजपुर में रविवार को कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसमें वर्तमान परिस्थितियों पर व्यंग्य करते हुए कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलित कर किया। युवा कवि मोहित लांबा ने कहा मैं हूं एक मुसाफिर मेरा यहां ठिकाना कहां, एक दिन यहां पर आया था एक दिन मुझको जाना है। डा. सुधीर ने सुनाया इस मौसम को पुजू क्या इसका मैं सत्कार करूं, सीमा के पहरेदारों का इस मौसम से सम्मान करूं। गीतकार विरेश मुकुल ने अपनी रचना यूं प्रस्तुत की मैं झीलों के सन्नाटों से बुना हिमालय का क्रंदन हूं। साहित्यिक संस्था संचेतना के महामंत्री डा. लोकेश वत्स ने कहा ऊंचे कद ओहदे वालों को सुनता और समझता है, बिन कपड़े भूखे नंगों की एक माना कर। ठाकुर रणधीर सिंह ने कहा है मानव एक मुसाफिर और दुनिया एक धर्मशाला, जो-जो आया इस जग में है सो-सौ जान वाला। मीरा चौरासिया ने कहा काम अधूरा रह जाए तो तुमकों पूरा करना है, आंसू एक न आंख में आएगा का ध्यान भी रखना है। अशोक शर्मा ने कहा मातृ भक्ति शक्ति की विलक्षण अभिव्यक्ति है, कैसे जीये जीवन बताती इसकी युक्ति है। अध्यक्षता मैनपाल और संचालन डा. सुधीर ने किया। कार्यक्रम में गंगाराम, प्रवीन, हेमलता, निवेंद्र कुमार, निखिल, रविंद्र आदि रहे।