रामपुर। बच्चों की स्मार्ट फोन से कदर नजदीकियां बढ़ गई हैं कि वह दिमागी संतुलन भी खो रहे हैं। जिला अस्पताल में स्थापित मन कक्ष में गेमिंग डिसऑर्डर से पीड़ित 14 वर्षीय बालक पहुंचा। मनोचिकित्सक अजमी नाज ने उसके पास से मोबाइल हटाया तो वह विचलित हो गया। हाथ झटकने लगा और जब तक उसे फोन नहीं मिला, शांत नहीं हुआ।
मन कक्ष में अवसाद, तनाव, गेमिंग डिसऑर्डर और अन्य समस्याओं से पीड़ित मरीज पहुंचते हैं। शनिवार को सिविल लाइंस निवासी 14 वर्षीय बालक को लेकर उसके परिजन पहुंचे। उन्होंने बताया कि काफी समय से यह पबजी नाम का एक गेम को खेल रहा है। घंटों इसमें बिजी रहता है। अब जरा सी देर मोबाइल हटने पर उसके सिर में तेज दर्द होता है और वह शोर मचाने लगता है।
मोबाइल मिलते ही ठीक हो जाता है। मनोचिकित्सक डॉ. अजमी नाज ने बताया कि उसको गेमिंग डिसऑर्डर हुआ है। बच्चे से धीरे-धीरे मोबाइल की लत छुड़ानी होगी। इसके साथ दवाएं भी लिखीं। उन्होंने इलाज के साथ काउंसलिंग कराने को भी कहा है। उन्होंने बताया कि आजकल अभिभावक बच्चों को मोबाइल फोन पकड़ा देते हैं। वह गेम के अलावा अन्य कई तरह के कंटेंट देखते हैं। इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
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स्क्रीन एडिक्शन से बचाएं
मनोचिकित्सक अजमी नाज ने बताया कि बच्चों के मुंह में बोतल लगाकर हाथ में मोबाइल थमाने से बच्चों में खाने की आदतों और आत्म नियमन क्षमता प्रभावित हो रही है। बताया कि जब बच्चे का मिजाज असामान्य हो जाता है, तो अभिभावक विशेषज्ञ के यहां दिखाने आते हैं। स्क्रीन का अधिक दुष्प्रभाव रोगी की आंखों और दिमाग पर हो रहा है। माता-पिता थोड़ी सी राहत के लिए बच्चों को खतरे में डाल रहे हैं।
ये होते हैं नुकसान
बच्चे में भाषा का ढंग से विकास नहीं होगा।
अलग-अलग खाने की पहचान, स्वाद पकड़ने में दिक्कत होगी।
मानसिक सहनशक्ति कम हो जाएगी।
नेत्र रोग हो सकते हैं, आंख की रोशनी प्रभावित होगी।
घर वालों से भावनात्मक लगाव कम होगा।
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ऑनलाइन गेम बच्चों की सेहत को बिगाड़ रहे है। बच्चों को स्मार्ट फोन देने का मतलब है कि वह अपनी जिंदगी से अनजाने में खिलवाड़ कर लेंगे। इसलिए बच्चों को कम से कम मोबाइल दें और इसकी मॉनिटरिंग भी करें कि बच्चा क्या देख रहा है।
-अजमी नाज, मनोचिकित्सक