शाहबाद। वर्ष 1962 में भारत और चीन के युद्ध में शहीद हुए शिवचरण के गांव तुरखेड़ा में आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। जलनिकासी, रास्ते के लिए शहीद का परिवार परेशान है। शहीद के परिवार के लोग अपने गांव में शहीद की मूर्ति की स्थापना कराने के लिए पिछले कई सालों से अधिकारियों से गुजारिश कर रहे हैं। हालांकि डीएम ने प्रतिमा स्थापित करने की मंजूरी दे दी है, लेकिन मंजूरी मिलने के बाद प्रतिमा की स्थापना नहीं हो सकी।
शहीद के बेटे रामचरण सिंह बताते है कि उनके पिता शिवचरण सिंह चीन सेना के विरुद्ध की गई कार्रवाई के दौरान मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। जिसके बाद वीरता प्रशस्ति पत्र वर्ष 1999 में मिला था। उसके बाद परिवार के लोग मूलभूत सुविधाएं चाहते थे। मूलभूत सुविधाओं के नाम पर एक खड़ंजा बना दिया गया था। जो अब जर्जर हालत में है। जलनिकास की समस्या आज भी परिवार के सामने ज्यों की त्यों है। बरसात के दिनों में नाले का पानी नहीं निकलता है। बल्कि सारा पानी शहीद के परिवार के घर में घुस जाता है। प्राथमिक विद्यालय में शहीद का बोर्ड लगा है, लेकिन बोर्ड असुरक्षित है। क्योंकि प्राथमिक विद्यालय की बाउंड्रीवॉल टूटी पड़ी है। शहीद के परिवार ने गांव में शहीद की मूर्ति लगवाने के लिए डीएम से गुहार लगाई थी। जिसके बाद 12 फरवरी 2024 को जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास अधिकारी के यहां से शाहबाद एसडीएम को मूर्ति स्थापना के लिए संस्तुति पत्र भेज दिया था, लेकिन सालभर बीत जाने के बाद मूर्ति की स्थापना नहीं हो पाई है।
शहीद के कपड़े और सामान ही घर पहुंचे
शाहबाद। भारत और चीन के युद्ध में शहीद हुए शिवचरण के बेटे की आंख से आज भी आसूं छलक आते हैं। इस युद्ध में शहीद हुए जवान का शव भी घर नहीं आया था। मात्र कपड़े और अन्य सामान परिजनों को भेज दिया था। सेना की सिफारिश पर शहीद के बेटे रामचरण को कृषि विभाग में नौकरी मिल गई थी। यह नौकरी शहीद के परिवार का पालन पोषण का जरिया बनी।
लगभग 68 साल पहले भारत और चीन का युद्ध हुआ था। रामचरण ने बताया कि उस समय में वह अपने पिता शिवचरण के साथ हल्द्वानी में रहते थे। जब अचानक भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ तो रामचरण को हल्द्वानी से वापस घर भेज दिया था। काफी दिन बाद जवान की कोई खबर नहीं मिलने पर रामचरण ने अपने पिता व मेजर को एक चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी में उस समय के हालातों का जिक्र किया था। जवान शिवचरण पानियर बिटालियन में शामिल थे और चीन से युद्ध कर रहे थे। एक दिन अचानक पोस्ट के जरिए एक सील बंद बिस्तर आया। जब उस बिस्तर को खोला तो शहीद के परिवार के लोग दंग रह गए। बिस्तर खोल कर जब देखा तो उसमे शहीद जवान के सेना वाले जूते, कपडे, और सामान थे। साथ ही एक फोटो भी था। उस समय जवान के बेटे रामचरण की उम्र लगभग बारह वर्ष थी। उस दौरान शहीद की पत्नी फूला के पूरे परिवार ने रोना शुरू कर दिया। उस दौरान एक तरफ शहीद होने का फक्र था, तो दूसरी और उनके चले जाने का दुःख भी काफी गहरा था। रामचरण ने बताया कि पिता के शहीद होने की खबर लगभग दो माह के बाद आई थी। लेकिन शव नहीं आया था। शहीद ने अपने परिवार में अपनी पत्नी फूला बेटे रामचरण, तीन बेटियां सोमवती, श्यामकली और सर्वेश को छोड़ा था। शहीद के बेटे बताते है कि गांव के लोग शहीद की शहादत को भूल चुके है। वर्ष 2005-06 में पूर्व राष्ट्रपति स्व. एपीजी अब्दुल कलाम ने बेंगलूरू में शहीदों के परिवारों को सम्मान देने व शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई थी।