रामपुर। शहर की पहचान सिर्फ नवाबी इमारतों, किले और शाही खानपान तक सीमित नहीं है। शहर के बीचोंबीच मौजूद रजा लाइब्रेरी की अलमारियों में रखी हजारों पांडुलिपियां सिर्फ धार्मिक या साहित्यिक ग्रंथ नहीं, बल्कि सदियों पुराने विज्ञान, चिकित्सा, ज्योतिष, इतिहास, कला, भाषा और संस्कृति का दस्तावेज हैं। इनमें कुछ ऐसी कृतियां भी हैं, जिनकी दुनिया में गिनी-चुनी प्रतियां ही मौजूद हैं। यह ज्ञान अब किताबों से निकलकर डिजिटल दुनिया की ओर बढ़ रहा है। लाइब्रेरी में रखे किताबी खजाने डिजिटलीकरण किया जा रहा है।
नवाबों के दाैर में शुरू की गई रामपुर की रजा लाइब्रेरी विश्व प्रसिद्ध है। पहले नवाब रहे फैजुल्ला खां को पढ़ने का काफी शौक था। साहित्य में रुचि रखने वाले नवाब फैजुल्ला खां ने अपने निजी निवास में ही पहले संग्रहालय संचालित किया। बाद में 1774 में लाइब्रेरी की स्थापना की गई। हामिद मंजिल में बने दरबार हाल से इसकी शुरुआत हुई। फिर नवाब फैजुल्ला खां का यह शौक जुनून में बदलता गया और यह लाइब्रेरी एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी में शामिल हो गई। इस वक्त यहां 17 हजार दुर्लभ पांडुलिपियां हैं, जबकि 60 हजार किताबों का संग्रह है। लाइब्रेरी अपनी स्थापना के ढाई सौ साल पूरा कर चुकी है। लाइब्रेरी में रखे ज्ञान के संग्रह और दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए संस्कृति मंत्रालय और रजा लाइब्रेरी बोर्ड की ओर से पांडुलिपियों का अब डिजिटाइजेशन कराया जा रहा है। लाइब्रेरी से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, अब तक 12 हजार से ज्यादा पांडुलिपियों का डिजिटाइजेशन पूरा किया जा चुका है।
हजरत अली के हाथ की लिखी कुरआन और सोने के पानी से लिखी रामायण है
दुनियाभर में मशहूर रामपुर रजा लाइब्रेरी में बेशकीमती किताबों का खजाना है। इसमें हजरत अली के हाथ से हिरन की खाल पर लिखी कुरआन है तो सुमेर चंद की सोने के पानी से फारसी में लिखी रामायण। नवाबी दौर में बनी लाइब्रेरी की इमारत भी आलीशान है। इसकी मीनारों में भाईचारे की झलक है। सबसे ऊपर मंदिर, उसके नीचे गुरुद्वारा, चर्च और मस्जिद की आकृति बनी है। लाइब्रेरी में सभी धर्मों से जुड़ी किताबें हैं। सुमेर चंद की फारसी में लिखी रामायण के शुरुआती पेज सोने के पानी से लिखे हैं। इसमें मुगलकाल के लघु चित्र भी हैं।
किताबों को संरक्षित करने के लिए किया जाता है जतन
लाइब्रेरी में किताबी खजाने के संरक्षण के लिए प्रयोगशाला बनी है। प्रयोगशाला के सीनियर टेक्नीकल रेस्टोरर अरुण सक्सेना बताते हैं कि पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने का भी विशेष तरीका है। वैज्ञानिक विधि से रसायनों का प्रयोग कर किताबों का संरक्षण किया जाता है। खाल पर लिखी कुरआन को फफूंदी व कीड़े मकोड़ों से बचाने के लिए एसिड फ्री बाक्स में रखा गया है। इसे समय-समय पर चेक किया जाता है, अगर कोई कमी नजर आती है तो फौरन प्राथमिक उपचार किया जाता है। तापमान का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके लिए 20 से 25 डिग्री तापमान होना चाहिए। इस कुरआन को करीब डेढ़ सौ साल पहले नवाब कल्बे अली खां सऊदी अरब से रामपुर लाए थे।
किताब/पांडुलिपि
खासियत
तारीख-ए-फिरोजशाही
दुनिया में ज्ञात तीन प्रतियों में एक
सहीफा-ए-नात-ए-मुहम्मदीदुनिया में एकमात्र उपलब्ध प्रति
फारसी रामायण-
1715 का अनुवाद, 258 चित्र
दीवान-ए-हाफिज
दुर्लभ सचित्र पांडुलिपि
जामे-उत-तवारीख-
मंगोल व एशियाई इतिहास का महत्वपूर्ण ग्रंथ
मुगलकालीन ग्रंथ
इतिहास, धर्म, साहित्य व विज्ञान के सचित्र ग्रंथ
नई पीढ़ी को ज्ञान का संग्रह उपलब्ध कराने के लिए 17 हजार पांडुलिपियों में से 12 हजार पांडुलिपियों का अब तक डिजिटाइजेशन किया जा चुका है। शेष पांच हजार का काम प्रगति पर है। रजा लाइब्रेरी में शोधकर्ता भी इसका लाभ उठाते हैं। डिजिटाइजेशन से नई पीढ़ी को काफी फायदा होने वाला है।
अरुण सक्सेना, वरिष्ठ रेस्टोरेर, रजा लाइब्रेरी रामपुर