एक शख्स जिसने एक चिकित्सक से चंद मिनटों की मुलाकात के बाद लोगों की अंधेरी जिंदगियों में नेत्र ज्योति को रोशन करने का सफर शुरू किया। साल दर साल गुजरते गए और आज इस शख्स के प्रयासों से न सिर्फ जिले के बल्कि मंडलभर के सैकड़ों लोग नेत्रदान के कारण इस दुनिया को देख रहे हैं।
इतना ही नहीं जल ही जीवन के वाक्य को सार्थक करते हुए नगर के लगभग हर कोने में प्यासों के लिए शीतल जल की व्यवस्था की। बिना किसी सरकारी मदद और स्वार्थ के अंधेरे जीवन में नेत्र ज्योति रोशन करने का जो बेड़ा करीब 17 साल पहले उठाया था, वह आज तक बदस्तूर जारी है।
लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करने और प्याऊ निर्माण के साथ ही अब इन्होंने देहदान के लिए भी लोगों को प्रेरित करना शुरू कर दिया है। उम्मीद की मशाल संस्करण में शहर की इस शख्सियत की कहानी जो पूरे समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।
उम्मीद की मशाल बने शहर निवासी सतीश भाटिया साल 1998 से नेत्रदान जैसा कार्य करने के लिए न सिर्फ लोगों को प्रेरित कर रहे हैं बल्कि अब तक करीब 190 लोगों द्वारा नेत्रदान करवाकर किसी अंधेरे जीवन में रोशनी भर चुके हैं। सतीश भाटिया बताते हैं साल 1998 में उनकी मुलाकात मुरादाबाद के नेत्र चिकित्सक डा. एके गोयल से हुई थी।
जिसमें डा. एके गोयल ने उनके सामाजिक कार्यों से प्रभावित होकर नेत्रदान करवाने के लिए प्रेरणा दी। इसके बाद से ही सतीश भाटिया लगातार लोगों से संपर्क कर उन्हें नेत्रदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पहला नेत्रदान मसवासी के एक जैन परिवार के सदस्य द्वारा किया गया था।
नेत्रदान से शुरू हुआ सेवा कार्य अब देहदान तक पहुंच चुका है। सतीश भाटिया कहते हैं कि पहले नेत्र बैंक कम होने के कारण उन्हें मुरादाबाद में नेत्रदान की प्रक्रिया करवानी पड़ती थी लेकिन, अब यह सुविधा शहर में हो गई है। करीब 17 साल में वह जिले भर में लोगों से संपर्क कर 190 लोगों को प्रेरित कर नेत्रदान करा चुके हैं।
जबकि तीन लोगों ने देहदान के लिए भी प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी कर दी है। सतीश भाटिया नेत्रदान के साथ ही प्यासों के लिए जल की उपलब्धता भी करा रहे हैं। वह अब तक नगर में विभिन्न स्थानों पर 26 प्याऊ का निर्माण करा चुके हैं।