पेड़ों की अंधाधुंध कटान, वन्य जीवों का शिकार और इंसानी दखल की वजह से चीतल को पीपली वन रास नहीं आया और एक-एक करके उत्तराखंड पलायन कर गए। वन में इक्का-दुक्का मोर दिखाई देते हैं। वन रोज (नीलगाय) की भी तादाद घट गई। हिरन, लोमड़ी, सांभर समेत तमाम वन्य जीवों की संख्या घट गई है। यह खुद वन विभाग का कहना है। हालांकि, वन में बंदरों की तादाद बढ़ी है।
पीपली वन में कीमती लकड़ी ही नहीं वन विभाग वन्य जीवों की भी सुरक्षा नहीं कर पाया। वन्य जीवों की संख्या अब न के बराबर रह गई है। वन रोज (नील गाय) की तादाद घट गई। सांभर और भेड़िए भी अब दिखाई नहीं देते हैं।
चीतल एक-एक कर उत्तराखंड की ओर पलायन कर गए। जबकि चार साल पहले पीपली वन में 50 से ज्यादा चीतल तलाशे गए थे। मोर और हिरन या तो शिकारियों की गोली का शिकार हो गए या फिर सुरक्षित स्थान पर पहुंच गए। वन में इक्का दुक्का ही मोर दिखाई देते हैं। जबकि, आंखों से ओझल हो गए। रात में अब लोमड़ी की आवाज सुनाई नहीं देती है। जंगली बिल्ली भी कभी कभार देखने को मिलती है।
वन के अंधाधुंध कटान और इंसानों की आवाजाही से वन्य जीवों की घट गई। हालांकि बंदरों की तादाद बढ़ी है। 2013 के सर्वे में बंदरों की तादाद 13487 थी जो अब बढ़ गई है। क्योंकि कहीं से बंदर पकड़कर पीपली या डंडिया वन में छोड़ दिए जाते हैं। वन विभाग के मुताबिक, 2018 में नया सर्वे होगा, जिसमें वन्य जीवों की मौजूदा स्थिति का पता चल पाएगा।