शारदीय नवरात्र में शुक्रवार को भक्तों ने मां के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की। भक्तों ने माता से रोग-शोक से मुक्ति के साथ ही सभी तापों के नाश का वर मांगा। मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की भीड़ रही तो दोपहर में मंदिरों और घरों में श्रद्धालुओं ने कीर्तन व छंद गाकर मां की महिमा का गुणगान किया।
शारदीय नवरात्र में शुक्रवार को मां कूष्मांडा के पूजन के लिए मंदिरों में श्रद्धालुओं की सुबह से ही भीड़ उमड़ पड़ी। शास्त्रों के अनुसार मां कूष्मांडा ने अपने उदर से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया था, इसीलिए इनका नाम कूष्मांडा पड़ा। पंडित नवनीत शर्मा बताते हैं कि मां कूष्मांडा के पूजन से मनुष्य के सभी रोग-शोक के साथ ही पापों का नाश होता है और हृदय और चित को असीम शांति की प्राप्ति होती है।
शुक्रवार को मंदिरों के कपाट खुलते ही भक्तों की कतार लगनी शुरू हो गई। श्रद्धालुओं ने घर पर पूजन व अज्ञारी के बाद मंदिरों में माता की पूजा-अर्चना की। माता को चूड़ी, सिंदूर, बिंदिया, चुनरी आदि श्रंगार का सामान अर्पित किया। इसके साथ ही मेवे और फल अर्पित कर कपूर से आरती की। माता को लौंग और पुष्प भी अर्पित किए।
नगर के श्री त्रिपुरेश्वरी शक्तिपीठ, मनोकामना मंदिर, प्राचीन श्री दुर्गा मंदिर, श्री हरि मंदिर, नर्मदेश्वर महादेव मंदिर, माई का थान, पंडित दत्तराम शिवालय आदि मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की गई। श्रद्धालुओं ने घरों में भी माता के छंद गए और पूजन कर दुर्गा सप्तशती का पाठ किया। साथ ही सिद्ध कुंजिका स्त्रोत के साथ ही श्रद्धालुओं ने कवच, कीलक और अर्गलास्त्रोत का पाठ भी किया।