भले ही सरकार की आरक्षण के जरिये महिलाओं की राजनीति में एंट्री कराने की मंशा हो, लेकिन इस मंशा पर अभी भी पुरुष प्रधान समाज हावी है। महिलाओं ने चुनाव तो जीत लिया, लेकिन जीत हासिल होने के बाद भी उन्हें जीत की खुशी सीधे तौर पर नहीं मिल सकी।
तमाम विजयी महिला प्रधान इतने अहम मौके पर भी घर की चहारदीवारी में कैद रहीं। जो पहुंची भी तो लोगों ने उन्हें फूलमालाओं से लादने के बजाय उनके पति और बेटों का स्वागत किया। यहां तक की सर्टिफिकेट भी उनके पति ने हासिल किया। पंचायत की राजनीति में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिया गया है।
इसके अलावा सामान्य सीट पर भी महिलाओं ने भाग्य आजमाया है। जिले की 684 ग्राम पंचायतों में 33 फीसदी सीटें महिला प्रत्याशियों के लिए आरक्षित हैं। अन्य वर्ग में भी महिलाओं ने प्रधानी का चुनाव लड़ा है। प्रधानी का चुनाव तमाम महिलाएं जीत भी गईं।
इस जीत के बाद भी उनको फूल मालाएं नसीब नहीं हुई। फूलमालाओं से उनके पतियों और बेटों को नवाजा गया। आरओ के पास तक महिला प्रधान नहीं पहुंचीं। जीत का प्रमाण-पत्र लेने के लिए महिलाओं की बजाए उनके पति और बेटे पहुंचे।